ब्यावर का शासन, प्रशासन और न्याय व्यवस्था



कर्नल डिक्सन के समय में सब प्रकार के दीवानी व फौजदारी झगडे़ पंचायत द्वारा दो तिहाई मत से निपटाये जाते थे। उन्होंने जेलों को, अपराधियों व उनके सम्बन्धियों से, अपराधी का जेल का व्यय लेकर, जेल को स्वावलम्बी बना दिया। यह विषय सन् 1857 ईसवीं की क्रान्ती तक चला। डि़क्सन साहिब ने फसल का हिसाब लगाकर एक तिहाई लगान वसूल करने का नियम बनाया। डिक्सन साहिब की सन् 1857 ईसवीं में मृत्यु के पश्चात अजमेर मेरवाडे का कोई कमिश्नर नियुक्त नहीं हुआ। डिप्टी कमिश्नर ही अजमेर मेरवाडे का शासन चलाते रहे।



सन् 1871 ईसवीं में अजमेर मेरवाडे का शासन भारत सरकार ने सम्भाल लिया व अजमेर मेरवाडे के लिए दस परगनो सहित एक चीफ कमिश्नर नियुक्त किया गया। चीफ कमिश्नर भारत के गवर्नर जनरल के राजपूताना की देशी रियासतों के लिए एजेन्ट भी बना दिये गये। उनका कार्यालय माउन्ट आबू होने के कारण अजमेर मेरवाडे के लिए एक कमिश्नर अलग से नियुक्त किया गया और एक डिप्टी कमिश्नर पहिले से ही था। वे ही अजमेर मेरवाडे का शासन चलाते थे और चीफ कमिश्नर के प्रति उत्तरदायी थे।



सन् 1877 ईसवीं में अधिक व्यय के कारण डिप्टी कमिश्नर हटाकर दो सहायक कमिश्नर रख दिये गये। उनमें से एक मेरवाडे का शासन सम्भालने लगे व बाद में उनका मुख्यालय ब्यावर कर दिया गया। इसके बाद मेरवाडे का शासन करने वाले सहायक कमिश्नर एक्स्ट्रा असिसटेन्ट कमिश्नर कहलाने लगे। अजमेर अलग से जिला होने के कारण वहाॅं के दूसरे सहायक कमिश्नर भी एक्स्ट्रा असिसटेन्ट कमिश्नयर कहलाये और केकड़ी में एस डी ओ रहे। माउन्ट आबू भी अजमेर मेरवाडे की तहसील बनी।



आरम्भ में एक्स्ट्रा असिसटेन्ट कमिश्नर अंगे्रज ही होते थे। बाद में भारत सरकार ने भारतीय को भी उच्च पद देने का निश्चय कर लिया और ब्यावर में भी प्रथम भारतीय एक्स्ट्रा असिसटेन्ट कमिश्नर बाबू पण्डित बृजजीवनलाल जी नियुक्त हुए। उनके बाद भगवती प्रसादजी, डिसूजा साहिब, किशनलालजी खन्ना, रामस्वरूपजी रावत, कय्यूम साहिब, मजीद साहिब, तथा दुर्गादत्तजी उपाध्याय आदि कई ई ए सी हुए। जब अजमेर मेरवाडा राज्य राजस्थान प्रदेश में मिला। तब उस समय यहाॅं पर पुरूषोत्तमदास जी खन्ना ई ए सी थे। अजमेर मेरवाडा भारत सरकार के अधीन होने के बाद ब्यावर में मुंसिफ मजिस्टेट का कोर्ट स्थापीत हो गया। बाद में सब जज का कोर्ट भी स्थापीत हुआ। इसके पहीले सहायक कमिश्नर या ई ए सी ही सारे फैसले किया करते थे। सन् 1875 ईसवीं में मुन्शी रामनारायण माथुर मुख्तियार ब्यावर की अदालतों में वकालत किया करते थे। सन् 1901 में सर्वश्री लक्ष्मीनारायण जी माथुर और बिहारीलालजी भार्गव एक दूसरे के विरूद्ध मुकदमों में पैरवी किया करते थे। इसके पश्चात धीरे धीरे वकीलों की संख्या बढ़ती गई।



1 नवम्बर सन् 1956 ईसवीं में मेरवाडा या ब्यावर उपखण्ड हो गया। तब से यहाॅं पर ई ए सी के स्थान पर उपखण्ड अधिकारी या उपजिलाधीश राजकाज चलाने लगे और अब सब जज का कोर्ट नहीं रहा।



वर्तमान में ब्यावर में उपखण्ड अधिकारी कार्यालय के अतिरिक्त दो फास्ट टेक ए डी जे (अतिरिक्त जिला क्षत्र न्यायालय) सिविल एवं फौजदारी, तीन ए सी जे एम (अतिरिक्त मुख्य न्यायीक मजिस्ट्रेट न्यायालय) और दो मुंसिफ मजिस्ट्रेट न्यायालय कार्यरत है।



आरम्भ में ब्यावर तहसील में तहसीलदार के अतिरिक्त चार नायब तहसीलदार भी हुआ करते थे। जो मसुदा, विजयनगर, टाटगढ़ व आबूरोड़ तहसील का कार्य देेखते थे। वर्तमान में ब्यावर में मात्र ब्यावर क्षेत्र की तहसील ही कार्यरत है जिसमें छः पटवारखाने सम्मीलित है। ये पटवारखाने ब्यावरखास, नून्द्री मेन्द्रातान, नून्द्री मालदेव, गड़ी, नृसिंहपुरा, नयानगर है। नायब तहसील अब मसूदा, टाटगढ़, विजयनगर, आबूरोड़ की तहसील के रूप में उनके मुख्यालय पर स्थित है। इस प्रकार ब्यावर उपखण्ड में वर्तमान में 216 राजस्व गाॅंव आते है। 30 मई सन् 2002 से पहिले ब्यावर उपखण्ड में 360 राजस्व गाॅंव आते थे। परन्तु 30 मई सन् 2002 को 144 राजस्व गाॅंवों को ब्यावर उपखण्ड से अलग करके मसूदा उपखण्ड के नाम से एक अलग उपखण्ड बना दिया गया। इस प्रकार ब्यावर उपखण्ड का विघटन कर दिया गया जो 1 नवम्बर सन् 1956 को राजस्थान का सबसे बड़ा उपखण्ड बनाया गया था।


Copyright 2002 beawarhistory.com All Rights Reserved