वर्तमान चुनाव प्रणाली की विसंगतियां 



रचनाकारः वासुदेव मंगल 




मतदान लोकतन्त्र की जान है और चयन मतदाता के दिल पर निर्भर है। लेकिन वर्तमान माहौल में मतदाता के समक्ष चयन का विकल्प कहाॅं है? कुछ संदिग्ध चरित्र के लोगों के बीच क्या चयन किया जाए? नरम शब्दों में कहंे तो एक अनजाने और दूसरे अनजाने के बीच कैसा चयन? अधिकाशॅंत्ः मतदाता के समक्ष यहीं स्थिति है फिर भी कहा जाता है कि मतदान करना आपका अधिकार ही नहीं, बल्कि पावन कर्तव्य भी है। लेकिन यह बात किसी से छिपी नहीं है कि बड़ी संख्या में लोग मतदान केन्द्र तक नहीं जाते हैं, क्योंकि मेरा विश्वास है, उन्हें लगता है कि सभी एक जैसे हैं तो क्यों मतदान करें? या कहें कि इधर कुआ, उधर खाई तो क्यों वोट डालें? 

इस स्थिति को सुधारने के लिहाज से ही मुख्य निर्वाचन आयुक्त ने सुझाव दिया कि उपरोक्त में से कोई नहीं का विकल्प भी मतदाता को दिया जाए। यदि कुल मतदान का 50 प्रतिशत या इससे ज्यादा इसी विकल्प का उपयोग करें तो पुनः चुनाव कराया जाए और नये उम्मीदवार मैदान में आये। सम्भवतः नये उम्मीदवार बेहतर होगें। यह एक अच्छा सुझाव था लेकिन सरकार ने इसे खारिज कर दिया। कहा कि व्यापाक सलाह मशविरा कर फैसला किया जायेगा। व्यापाक सलाह मशविरा करने को आम राय बनाना भी कहते है। यह एक ऐसा तरीका है जिसे राजनेता अपने स्वार्थ में आडे आने वाले किसी भी कदम को टाल देते है। यही कारण है कि कोई बडा या सार्थक चुनाव सुधार सम्भव नहीं हो पाया है। वर्षो से बल्कि दशकों से उक्त मांग उठ रहीं है। इतनी लम्बी अवधि में व्यापक से भी ज्यादा व्यापक सलाह मशविरा किया जा सकता है या मुख्य निवार्चन आयुक्त का कोई नहीं का सुझाव भी नया नहीं है। अनेक अन्य कदमों के साथ, इसकी सिफाारिश 1995 में विधि आयोग ने की थी। 

एक समानुपातिक प्रतिनिधित्व का सुझाव भी सराहनीय है। समानुपातिक प्रतिनिधित्व तथा उपरोक्त में से कोई नहीं की व्यवस्था से हमारी चुनावी राजनीति की तस्वीर ही बदल जायेगी। कई बुराईयां खत्म हो जाएगी। जीतने वाले उम्मीदवारों और पार्टियों की विश्वसनीयता बढ़ जाएगी। इन सुधारों से बदमाशों और अपराधियों का सफाया हो जाएगा। जातिवादी और साम्प्रदायिक तत्व भी छंट जाएंगे। वोट खरीदे नहीं जा सकंेगे और विभाजनकारी राजनीति मिट जाएगी। 


जो उम्मीदवार जीतते है वे बहुत कम वोटों के आधार पर ही जीतते है। यह ऐसा तथ्य है कि बहुमत का समर्थन लोकतान्त्रिक बुनियाद को ही ध्वस्त कर देता है। सबसे ज्यादा वोट पाने वाले के जीतने की वर्तमान व्यवस्था प्रतिनिधि मूलक लोकतन्त्र के अनुरूप नहीं है। उदाहरण के लिये कुल जनता का करीब साठ प्रतिशत ही मतदाता होते है। उनका भी साठ प्रतिशत ही मतदान करता है। मत औसतन दस उम्मदवारों के बीच बॅंट जाता है ऐसी स्थिति में कई बार जितने वाले उम्मीदवार को 25 प्रतिशत वोट मिल पाता है। उसकी जीत को लोक समर्थन कैसे माना जा सकता है। पिछले दो लोकसभा चुनाव में यह विसंगति और भी ज्यादा उभरकर आई। 1998 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 26.5 प्रतिशत वोट पाए और 182 सीटें जीती। कांगे्रस को भाजपा से ज्यादा वोट मिले लेकिन सीटें 41 कम मिली। 1999 में भाजपा के वोट घटकर 23.7 प्रतिशत रह गए लेकिन सीटों की संख्या वहीं 182 रहीं। कांगे्रस के वोट बढ़कर 28.3 प्रतिशत हो गए लेकिन सीटें मात्र 114 ही मिली। यह स्थिति है उसकी, जिसे लोक समर्थन राष्ट्रीय चुनाव परिणाम या जनादेश नाम दिया जाता है। कोेई आश्चर्य नहीं कि लोगों का इस व्यवस्था से मोह भंग हो रहा है। इस व्यवस्था में अल्पमत का समर्थन पाने वाले सत्तारूढ़ हो जाते है और संदिग्ध पृष्ठभूमि वाले जीत जाते है। इसलिए कोई आश्चर्य नहीं कि इस व्यवस्था से लाभान्वित होने वालेे, चुनाव सुधार के किसी भी कारगर सुझाव को रद्द कर देते हैं जैसे कि मुख्य निवार्चन आयुक्त का सुझाव खारिज कर दिया गया। 

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