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30 जून 2016 को
ब्यावर के संस्थापक कर्नल चाल्र्स जार्ज डिक्सन
की 221वीें जयन्ति पर विशेष
ब्यावर को प्रजातान्त्रिक समाजवादी धर्मनिरपेक्ष के सिद्धान्त पर बसाया था।
रचनाकार - वासुदेव मंगल


कर्नल डिक्सन मानव मूल्यों के प्रणेता थे। वह शासक होते हुए भी उन्होंने अपनी प्रजा की तन मन धन से सेवा की। इसलिए प्रजा भी उनको तह दिल से चाहती थी। उन्होनंे सोचा कि मध्य अरावली की सुरम्य घाटी में सैनिक छावणी उचित नहीं है। अतः उन्होंने नये सिरे से नागरिक बस्ती बसाई। इस क्षेत्र को नया नगर का नाम दिया। चूंकि इस शहर से चारों तरफ की देशी रियासतों के व्यापारिक मार्ग गुजरते थे। अतः इस क्षेत्र के महत्व को समझते हुए उन्होंने, कि उसके पृष्ट भाग में चारों तरफ दूर दूर तक चरागाह है और साथ ही खुले मैदानों में काली चिकनी मिट्टी में कपास की असीमित पैदावार होती है। अतः उन्होंने इसलिए ब्यावर को ऊन और कपास की तिजारत की मण्डी बनाया। यह उनकी दूर दृष्टि ब्यावर को राष्ट्रीय स्तर पर और अन्र्तराष्टीय स्तर पर व्यापार के क्षेत्र में 19वीं सदी के उत्तरार्द्ध में और 20वीं सदी के पूर्वाद्ध में विश्व में ख्याति दिलाई। 
एक बार महर्षि दयानन्द सरस्वती ने अपने ब्यावर प्रवास के दौरान महान् देशभक्त श्यामजी कृष्णवर्मा को एक प्रश्न पूछा, कि श्याम, यह एक छोटा सा नगर, जो दक्षिण से उत्तर की ओर ढलवा पठार पर बसा हुआ है, जिसमें सभी धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्र के लोग बडे प्यार और मोहब्बत से अपने-अपने कारोबार करते हुए बडे ही प्रेम और भाईचारे के साथ निवास करते है, यह कौनसे फरिस्ता का काम है जिसने इस शहर को बसाया? श्यामजी कृष्ण वर्मा ने उत्तर दिया गुरूदेव, यह एक अंगे्रज फौजी सैन्य अधिकारी ड़िक्सन ने इस शहर को बडे ही नायाब और वैज्ञानिक तरीके से सलीब की आकृति पर बसाया जो दूनिया का एक मात्र शहर है। 
यह शहर पहाड़ीयों और जंगलों की बीच में बसाया गया था, इसलिये डिक्सन साहिब ने इस शहर को बि-अवेयर का नाम दिया था, जो बोल चाल की भाषा में ब्यावर कहलाने लगा। ड़िक्सन साहब ने दूर की सोचते हुए नया शहर, सारोठ और टाटगढ (बरसाबाडा) की तरसीलों को मिलाकर एक जिला बनाया, जिसको ब्यावर जिले के नाम दिया और ब्यावर को इस जिले का मुख्यालय बनाया। इतना ही नहीं अपित् पाँच ओर नई तहसील क्रमशः मसूदा, बिजयनगर, बदनौर (बदनपुर), भीम (मण्डला) और आबू को मिलाकर मेरवाड़ा बफर (स्वतंत्र) स्टेट बनाया। इस राज्य का मुख्ययालय ब्यावर शहर को बनाया। इस तरह, ब्यावर को अन्तराष्ट्रिय पहचान दिलाई। यहाँ तक की उस वक्त ब्यावर, सम्पूर्ण भारतवर्ष में सरकार को टेक्स देने वाला एकमात्र अव्वल नम्बर का व्यापारिक शहर था।
अतः मानवता के इस आदर्श के कारण ब्यावर के नागरिकों ने शहर की मुख्य चैपाटी पर सन् 1886 ई. में उनकी यादगार में आस्था का एक खुला झरोखा (छत्री) बनाया। जिसपर सभी धर्म और जाति के लोग धोक लगाते थे। तद्न्तर सन् 1958 में इसके ऊपर तत्कालीन नगर अध्यक्ष ने विट्ठल टावर का निर्माण करा दिया। तब ब्यावर के एक जागरूक नागरिक स्व. श्री कन्हैयालाल पौद्दार ने जनहित याचिका के जरिये राजस्थान उच्च न्यायालय से विट्ठल टावर को हटाने के आदेश करवाये। इस क्रम में तत्कालीन नगर अध्यक्ष को विट्ठल टावर हटाना था। परन्तु उन्होंने आस्था के झरोखे डिक्सन छत्री का हटा दिया। अतः यह संविधान का खुल्लम-खुल्ला उलघंन हुआ। यह हादसा सन् 1972 में घटित हुआ। जब ब्यावर की जनता बुरी तरह से परेशानी से ग्रसीत हो गई, तब ब्यावर के नागरिकों ने पुनः सन् 2004 की 24 अप्रेल को इसी स्थान पर ढाई फीट नीचे डिक्सन की छत्री बनाने के लिए ताम्र-पत्र रखा और डिक्सन छत्री का निर्माण आरम्भ किया। यह छत्री सन् 2005 के सितम्बर माह के पहिले पखवाडे में बनकर तैयार हो गई थी। जिसका लोकार्पण 17 सितम्बर सन् 2005 में बडे ही समारोह पूर्वक किया गया। 
इस कारण जो देवदोष था वह दूर हुआ और सभी क्षेत्रों में ब्यावर विकास करने लगा जैसे कृषि, उद्योग, व्यापार इत्यादि। उस समय जमाना भी अच्छा हुआ।
परन्तु बडे खेद के साथ लिखना पड रहा है कि 13 जनवरी सन् 2007 की मध्य रात्रि को ब्यावर के तत्कालीन प्रशासनिक अधिकारी जिनके पास उपखण्ड अधिकारी का कार्यभार भी था, ने चोरी छूपके डिक्सन के इस चबूतरे पर गुमनाम प्रतिमा का बिना प्राण प्रतिष्ठा के पुनः अवरोध करवा दिया। अतः पुनः देवता और देवी को दोष आरम्भ हो गया, जो आज दिन तक भी बरकरार है क्योंकि यह तो डिक्सन का देवरा है जिसपर धोक लगाई जाने का शिलशिला दूबारा शुरू किया गया था। परन्तु पुनः इस चबूतरे पर अवरोध पैदा कर दिया गया। 
अतः तब से लेकर आज तक ब्यावर बराबादी के कगार पर पुनः आ गया। जिसका निदान स्थानीय प्रशासन को तुरन्त करना है। हालाकिं तत्कालीन प्रशासनिक अधिकारी कुछ समय पूर्व जोधपुर में सरकारी नौकरी से किसी अन्य प्रकरण मंे बरखास्त कर दिये गये। लेकिन उनके इस घिनौने कृत्य से ब्यावर की बरबादी आज भी बरकार है। अतः लेखक इस लेख के जरिये ब्यावर के नगर अध्यक्ष से मांग करता है। कि डिक्सन छत्री पर किये गये अवरोध को तुरन्त प्रभाव से धार्मिक भव्य जुलुस के जरिये समारोह पूर्वक इस प्रतिमा को किसी अन्य उचित स्थान पर प्राण-प्रतिष्ठा के साथ प्रतिस्थापित कराई जावे ताकि देवता और देवी का दोष दूर हो सके और ब्यावर तरक्की के रास्ते पर अग्रसर हो सके। वाजिब जानकर यह मांग समय की पुकार है जिसे शिघ्र अतिशिघ्र कार्यान्वित किया जावे। धन्यवाद। 
यह ही आज ब्यावर के संस्थापक कर्नल डिक्सन की 221वीें जयन्ति पर उनको हार्दिक और रचनात्मक व सकारात्मक श्रंद्धाजलि होगी। 

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