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ब्यावर का इतिहास 
  
रचनाकारः वासुदेव मंगल 
  
ब्यावर का इतिहास वास्तव में मेरवाडे का इतिहास है और मेरवाडे़ का इतिहास अजमेर के साथ जुड़ा हुआ है। 
अतः ब्यावर के इतिहास को जानने से पहीले अजमेर के विषय में जानकारी प्राप्त करना अति आवश्यक है। अतः ब्यावर का इतिहास तीन भाग में है। 
  
प्रथम भाग: अजमेर प्रदेश व उसकी शासन पद्धति  

दूसरा भाग: मेरवाड़ा प्रदेश व उसकी गतिविधियाॅं  

तीसरा भाग: ब्यावर का उदय और उसका विस्तार व विकास


  
प्रथम भाग: अजमेर प्रदेश व उसकी शासन पद्धति 

लेखक-  वासुदेव मंगल
  
ब्यावर वास्तव में अजमेर प्रदेश का दक्षिणी पश्चिमी भाग रहा है। अजमेर प्रदेश को अजय नामक मेर सरदार ने मध्य अरावली पहाड़ी के नीचे सुन्दर व सुराक्षित स्थान पर बसाया। इस प्रदेश के निवासी आदिवासी मेर जाति के लोग थे जो सिन्ध व पश्चिमी राजपूताना से आकर यहाॅं बस गये थे। अजमेर में तत्कालीन आवश्यकतानुसार व्यवसाय व व्यापार करने वाले सब जाति के लोग बसगये और अजय सरदार के वंशज यहाॅं राज्य करते रहे। भारत में ईसा पूर्व पाॅंचवी श्ताब्दी में बौद्ध धर्म राज्य धर्म होने के कारण बौद्ध धर्म का प्रचार बढ़ गया और अजमेर भी बोद्ध धर्मावलम्बी लोंगों का नगर हो गया।
सातवीं श्ताब्दी में साॅंभर /शाकम्भरी/ के राजा अजयपाल चैहान ने अजमेर को जीत लिया और तारागढ़ पहाड़ पर एक किला बनवा लिया। अजयपाल चैहान ने मेरों को दक्षिण पूर्व में खदेड़ दिया जहाॅं ये लोग लड़ाकू कौम के हो गये और लूटमार कर अपना निर्वाह करने लगे। कुछ लोग कृषि भी करते थे। इस प्रकार इस प्रदेश का नाम मेरों के कारण मेरवाड़ा हो गया। 
अजयपाल चैहान ने आस पास के गाॅंवों को अजमेर मेरवाडे़ में मिलाकर उनसे लगान व हासिल लेना आरम्भ कर दिया। उस समय बड़ली नगर /वर्तमान में बलाड गाॅंव/ एक अच्छा धनी कस्बा था। गाॅंव का लगान व हाॅंसिल यहीं पर बसूल किया जाता था। आॅंठवी शताब्दी में राजपूतों की शक्ति बढ़ गयी। उन्होंने ब्राहम्णों के धर्म का प्रचार किया। इस समय जगत् गुरू श्री शंकराचार्यजी का प्रादुर्भाव हुआ जिन्होंने समस्त भारत में भ्रमण कर सनातन धर्म का प्रचार किया। अतः यहाॅं के बहुत से निवासी सनातन धर्मी हो गए यानि हिन्दु हो गये। 
इसी काल में जैन धर्म जिसका भारत में पहीले से प्रचार था और भी फैल गया। जो बौद्ध सनातन धर्मी नहीं बने वे जैनी बन गये क्योंकि जैन धर्म व बौद्ध धर्म के सिद्धान्तों में काफी तालमेल था। अजमेर में भी बौद्ध धर्म का विरोध होने के कारण जैन धर्म का प्रचार हुआ। इस प्रकार अजमेर के बौद्ध भी जैनी हो गये। जैन धर्म का विरोध प्रजा धर्म होने के कारण हुआ। अतः अजमेर में सनातन धर्म के साथ साथ जैन धर्म भी पनपता रहा। अजमेर में जैन धर्मावलम्बियों ने एक शिल्प विद्यालय की स्थापना की जहाॅं पर सॅंस्कृत भाषा के साथ साथ शिल्प कला भी सिखायी जाती थी। 
ब्यावर अजमेर से जुड़ता दक्षिण का 1467 फीट एक उॅंचा पठारी अरावली की छोटी छोटी छीतरी हुई पहाडि़यों से आच्छादित मैदान है। 
996 ई. में सुबुक्तगीन ने भारत पर आक्रमण किया। 997 में सुबुक्तगीन की मृत्यु के पश्चात् महमूद गजनबी ने शासन की बागडोर सम्भाली। उसने सन् 1000 से 1029 तक भारत पर सत्रह बार आक्रमण किये। सन् 1008 व 1009 ई. में राजा आनन्दपाल ने महमूद गजनबी के विरूद्ध उज्जैन, कालिंजर, ग्वालियर, दिल्ली व अजमेर का सॅंघ बनाया। 
सन् 1191 ई. में मुहम्मद गौरी ने भारत पर आक्रमण किया। उस समय पृथ्वीराज चैहान दिल्ली व अजमेर के राजा थै। ये सभी आक्रान्ता अफगान थे जो हिन्दू कुश पर्वत पार कर भारत आये। मुहम्मद गौरी भारत के जीते हुए प्रदेश कुतुबुद्वीन ऐबक को सौंप गया। कुतुबुद्वीन मेरठ कोल व दिल्ली को जीतकर और दिल्ली को राजधानी बनाकर दिल्ली में राज करने लगा। फिर उसने अजमेर पर विजय प्राप्त की और यहाॅं के राजा को कर देने की शर्त पर अजमेर लौटा दिया। अजमेर में नियन्त्रण रखने के लिये एक मुसलमान अफसर को नियुक्त किया। इसके साथ ख्वाजा मुईनुद्धिन चिश्ति भी बावन वर्ष की आयु में अजमेर आये थे। यहाॅं उन्होंने इस्लाम धर्म का प्रचार किया। सन् 1236 ई. में 95 वर्ष की आयु में उनका स्वर्गवास हुआ। इस प्रदेश में इस्लाम धर्म का प्रचार होने के कारण अनेक मेर मुसलमान हो गये। यहाॅं तक कि समस्त बड़ली नगर पर मुसलमानों का कब्जा हो गया। मुसलमान मेर अपने को मेहरात कहने लगे और हिन्दू अपने को रावत कहने लगे। परन्तु एक दूसरे के त्यौहार व रस्म रिवाज को मानते थे और आपस में शादी विवाह का सम्बन्ध भी रखते थे। 
अजमेर पर अकबर बादशाह ने सन् 1559 ई. में विजय प्राप्त कर अजमेर मेरवाड़े को अपने अधीन कर लिया। सन् 1570 ई. में उन्होंने ख्वाजा मुईनुद्धिन चिश्ति की मस्जिद /दरगाह/ का निर्माण करवाया। 
सम्राट अकबर के बाद उसका पुत्र जहांॅगीर सन् 1613 ई. से सन् 1616 ईं. तक रहा। सर टामसरो ने यहीं सन् 1615 ई. में बादशाह जहाॅंगीर से व्यापारिक सुविधाऐं प्राप्त की थी। शाहजहाॅं ने सन् 1615 ईं. में आनासागर के किनारे बारह दरी बनवाई। 
दारा शिकोह को सन् 1659 ई. में औरंगजेब ने दोराही में घेर लिया। औरंगजेब ने जैन शिल्प विद्यालय को तुडवाकर ढहाई दिन का झोपड़ा नामक ईमारत में बदल दिया। 
औरंगजेब की मृत्यु के बाद भारत में मराठा शक्ति का उत्थान हुआ व मराठों ने सन् 1756 ई. में अजमेर पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया। अन्तिम मराठा सरदार बापूजी राव सिंधीया ने अजमेर को सन् 1818 की 20 नवम्बर को एक संधि के तहत निमच के बदले अंग्रेजों के सुपुर्द कर दिया। तब से अजमेर पर अंग्रेज राज करने लगे।    





  
दूसरा भाग: मेरवाड़ा प्रदेश व उसकी गतिविधियाॅं 

लेखक-  वासुदेव मंगल
  
ब्यावर के इतिहास से पुर्व प्रथम भाग में अजमेर क्षेत्र के इतिहास का संक्षिप्त वर्णन किया गया था। अब इस भाग में मेरवाड़ा प्रदेश में निवास करने वाली मेर जाति के सम्बन्ध में विस्तृत वर्णन किया जा रहा है जो इस प्रकार हैः- 
  
अन्त में काठाजी ने इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया था और उसके बाद उनकी सन्तानों ने निरन्तर बढ़ चढ़ कर अथूण, झाक, श्यामगढ़, चिताड़, नाणना इत्यादि अनेक स्थानों पर अपना अधिकार करके स्वयं शासन करना आरम्भ कर दिया। यह बात मारवाड़, मेवाड़ तथा ढूंढार के राजाओं को अच्छी नहीं लगी। फलस्वरूप इन रियासतों के राजाओं ने इनके उपर विजय पाने के लिये आठ बार आक्रमण किये लेकिन सफल नहीं हुए। आखीरकार नसीराबाद फौजी छावनी के अग्रेजों ने इन राजाओं की सहायता से मेरों पर विजय प्राप्त की और इस क्षेत्र को अपने अधिकार में लेकर यहाॅं पर ब्यावर के नाम से एक नई फौजी छावनी बनाई जहाॅं पर नये अग्रे्रंज फौजी सुपरिन्टेन्डेन्ट कर्नल हेनरी हाॅल को नियुक्त किया। 
  
प्रथम युद्ध सन् 1725 ई. मेंः- 
  
सबसे पहीले जयपुर महाराज जयसिंहजी ने झाक पर सन् 1725 ई. में विशाल सेना के साथ चढ़ाई की। झाक के निवासी अपने शरणार्थी पड़ासोली के ठाकुर देवीसिंहजी को लेकर पहाड़ों में चले गये। कुछ समय पश्चात झाक निवासीयों ने जयसिंहजी के सेनिकों पर आक्रमण कर दिया। विवश होकर जयपुर की सेना भाग गई। 
  
द्वितीय युद्ध सन् 1754 ईं. मेंः- 
  
महाराणा उदयपुर की ओर से ठाकुर बदनोर व मसूदा के ठाकुर सुल्तानसिंह ने अपने नेतृत्व में झाक और अथून पर सन् 1754 में विशाल सेना के साथ आक्रमण किया। इस युद्ध में मसूदा के ठाकुर सुल्तानसिंह मारे गये और बदनोर के ठाकुर युद्ध के मैदान से भाग गये। इस प्रकार दूसरी बार भी मेरों की शानदार विजय हुई। मेर जाति में रावत, मेहरात, काठात व चीता जाति के लोग सम्मिलित थे। 
  
तृतीय युद्ध सन् 1778 ईं. मेंः- 
  
जोधपुर के महाराज विजयसिंहजी ने चाॅंग गाॅंव को विजय करने हेतू विशाल सेना भेजी। लेकिन यह सेनिक बिहड़ जंगलों में रास्ता भटक गये और चाॅंग नहीं पहुॅंच सके तथा उनको बिना युद्ध किये ही वापिस लौटना पड़ा। कुछ ही दिनों बाद रायपुर के ठाकुर अर्जुनसिंह से जोधपुर से बहुत बड़ी फौज मंगाकर घोड़ातों के गाॅंव कोटकिराणा पर हमला बोल दिया। गाॅंव के बहादुर निवासियों ने रास्ते में ही बहादुरी से डटकर मुकाबला किया। मारवाड़ के अनेक सेनिक मारे गये तथा शेष सेना युद्ध के मैदान से भाग गई।
  
चतुर्थ युद्ध सन् 1790 ईं. मेंः- 
  
मारवाड़ कंटालिया के ठाकुर ने जोधपुर से बहुत बड़ी सेना मंगाकर रावतों के गाॅंव टाटगढ़ पर चढाई कर दी। घमासान युद्ध हुआ। कंटालिया के ठाकुर इस युद्ध में मारे गये। रावतों ने मारवाड़ की सेना के छक्के छुड़ा दिये। उनकी छावनी लूट ली। अन्त में जीत रावतों की हुई।
  
पंचम युद्ध सन् 1800 ईं. मेंः- 
  
अजमेर के सुबेदार शिवाजी सिंधिया ने मराठा शासक बालाजी राव के साथ 60 हजार सैनिकों के साथ झाक व श्यामगढ़ के मेरवाड़े पर चढ़ाई कर दी। इस युद्ध का मुकाबला रावत तथा मेहरातों ने संगठित रूप से किया था। मराठों की फौज के हजारों सिपाही इस युद्ध में मारे गये। अन्त मंे बालाजी राव युद्ध के मैदान से भाग निकले। अन्त विजय रावत तथा मेहरातों की ही हुई।
  
षष्टम् युद्ध सन् 1810 ईं. मेंः- 
  
मारवाड़ के राजा मानसिंह ने मंडोर फौज की सहायता से ग्राम झांक पर चढ़ाई कर दी। इस युद्ध में महाराज मानसिंह और झाक निवासियों में घमासान लड़ाई हुई। महाराजा के अनेक सिपाही मौत के घाट उतार दिये गये। महाराजा मानसिंह युद्ध के मैदान से भाग निकले। विजयश्री झाक निवासियों को मिली।
  
सप्तम् युद्ध सन् 1816 ईं. मेंः- 
  
महाराजा भीमसिंहजी मारवाड़ ने भगवानपुरा के ठाकुर के नेतृत्व में रावतों के गाॅंव बरार पर हमला किया। इस युद्ध में भगवानपुरा के ठाकुर मारे गये और विजयश्री रावतों को मिली।
  
अष्टम् युद्ध सन् 1817 ईं. मेंः- 
  
अजमेर पर ईष्ट इण्डिया कम्पनी का अधिकार हुआ था और अग्रेंजों ने मेरवाड़े पर नजर रखने के लिए नसीराबाद फौजी छावनी बनाई थी। थोडे़ ही दिनों में झाक, लूलवा, श्यामगढ़, बोरवा, अथूण, कूकड़ा, बरसाबाड़ा /टाटगढ़/ यानी रावत मेहरातों के गाॅंवों के अलावा सभी राजपूत व अन्य जातियों ने अंगे्रजों की अधीनता स्वीकार कर ली थी। गवर्नर जनरल ने तीन फौजी इन्जिनियर अफसरों के साथ कर्नल हेनरी हाॅल को बहुत बड़ी फौज देकर भेजा जो झाक, लूलवा, श्यामगढ़ पर चढ़ाई करने के लिए देलवाड़ा आ डटा। यह बात खुफिया के जरिये झाक, लूलवा, श्यामगढ़ निवासियों को मालूम पड़ गई जो पाखरियावास के घाटे में अंगेंजी सेना के विरूद्ध जबरदस्त नाकेबन्दी कर दी। विवश होकर अंगे्रजी सेना को वापिस खरवा लौट जाना पड़ा। परन्तु मेरों ने खरवा जाकर अंगें्रजी सेना के सन्तरियों को मारकर अंगे्रजी सेना के साथ घमासान युद्ध किया। इस युद्ध में अनेक अंगे्रज सिपाही मौत के घाट उतार दिये गये। बचे हुए सिपाहियों ने कर्नल हेनरी हाॅल निराश होकर नसीराबाद लौट गया। इस युद्ध में इन तीनों गाॅंवों के कई वीरों ने वीर गति प्राप्त की।
  
नवम् युद्ध सन् 1819 ईं. मेंः- 
  
सन् 1819 ई. के मार्च महिने में कर्नल हाॅल व मेजर लोरी ने अंगे्रजों की तीसरी रेजीमेन्ट व भारी संख्या में रसाला एवं भारी भारी आधुनिक तोपें हाथीयों पर लादकर लगभग सात हजार सैनिकों के साथ रवाना हुए। इस सेना को तीन भागों को बांटकर अंग्रेजी फौजी अफसर ने एक साथ झाक, लूलवा, श्यामगढ़ तीनों गाॅंवों पर अलग अलग हमले बोल दिये। इस अचानक तोपों से किये गये तीन तरफा युद्ध में तीनों गाॅंवों के निवासी इक्टठा होकर नहीं लड़ सके और न ही उनके पास तोपों से युद्ध करना मुमकीन था। देखते देखते अंगे्रजी सेना ने दन तीनों गाॅंवों को खण्डहरों में बदल डाला। हजारों वीरों ने इस युद्ध में वीरगती प्राप्त की। अन्त में जीत अंग्रेजों की हुई। अंगे्रजों ने इन तीनों गाॅंवों को जीतने के पश्चात बोरवा और अथूण गाॅंव पर भी चढ़ाई कर दी। अथूण में उस समय भूपत खान ने अंगे्रजों को मुकाबला किया। परन्तु आधुनिक तोपों की आग के गोलों के सामने वे टिक नहीं सके और भाग कर गाॅंव रामगढ़ /सेन्दड़ा/ में शरण ली। परन्तु वहाॅं पर भी अंग्रेजी सेना पीछा करती हुई आ गई। भूपत खान ने रावत मेहरातों की सहायता से यहाॅं भी अंगे्रजी सेना के साथ जमकर युद्ध किया। रामगढ़ /सेन्दड़ा/ के इस युद्ध में भूपत खान के अनेक साथी मारे गये और अनेक साथी अंगे्रजों द्वारा बन्दी बना लिये गये जिसमें भूपतखान के उत्तराधिकार पुत्र लाखाजी खान भी थे। इस युद्ध के पश्चात पूरे मेरवाड़े पर अंग्रेजों का अधिकार हो गया।    

  
   
तीसरा भाग
ब्यावर का उदय और उसका विस्तार व विकास

लेखक-  वासुदेव मंगल
मेरवाड़ा प्रदेश पर कब्जा करने के बाद अंगे्रज हुक्मरान ने मेरवाड़ा, मेवाड़ और मारवाड़ पर नजर रखने के लिये राजपूताना के मध्य भाग में एक केन्द्रिय फौजी छावनी का निर्माण किया। अंगे्रजों ने मेरों से जो बत्तीस गाॅंव जीते थे उनका सीधा नियन्त्रण करने के लिये सन् 1823 ई. में ब्यावर में कर्नल हैनरी हाॅल के नेतृत्व में यानि देखरेख में एक नई फौजी छावनी का निर्माण किया जहाॅं पर 144 मेरवाड़ा बटालियन को स्थाई तौर पर तैनात किया। यह छावनी ही ब्यावर छावनी के नाम से जानी जाती रही है।
इससे पहीले अंगे्रजों ने कोटा, बूंदी रियासतों और हाड़ोती प्रदेश पर नजर रखने के लिये देवली में फौजी छावनी स्थापित की। तत्पश्चात् सिरोही रियासत पर नजर रखने के लिये राजपूताना में एरनपुरा रोड़ में अंगे्रजी फौजी छावनी बनाई और अब अजमेर की छावनी तो अजमेर किशनगढ़ रियासत पर नजर रखती थी और मेरवाड़ा प्रदेश जीतने पर ब्यावर में एक नई चैथी अंगे्रजी फौजी छावनी का निर्माण किया।
चूॅंकि कर्नल हैनरी हाॅल के नेतृत्व में ही यह ईलाका जीता गया था। अतः हाॅल को ही इस छावनी का सरवराह बनाया गया। हाॅल ने यहाॅं पर सन् 1823 से लेकर 1835 तक तेरह साल तक इस छावनी पर हुकुमत की। सन् 1835 ईं. में कर्नल हैनरी हाॅल के इस्तीफा देने पर कर्नल चाल्र्स जार्ज डिक्सन को हैनरी के स्थान पर ब्यावर छावनी का सरबराह बनाया जो उस समय अजमेर शस्त्रागार के प्रभारी अधिकारी थे।
ब्यावर छावनी का कार्यभार सम्हालने पर डिक्सन ने देखा कि मेर जाति पर जोर जबरदस्ती से हुकुमत नहीं की जा सकती है। अतः उन्होंने प्यार मोहब्बत का रास्ता अख्तियार किया। उन्होंने मेर निवासियों को समझाया कि लूटपाट करना अच्छा काम नहीं है। बेहतर जिन्दगी बसर करने के लिये इन्सान को मेहनत परिश्रम कर गुजर बसर करना चाहिये। इस भागीरथ कार्य को अन्जाम देने के लिये डिक्सन ने उनकी लड़की चाॅंद बीबी से निकाह किया। उनके दुख दर्द को अपना दुख दर्द समझकर मेर निवासियों को उनके हर कार्य में प्रत्यक्ष रूप से सहायता करनी आरम्भ की। उनके काश्तकारी और पशुपालन कार्य को करने में उनको आर्थिक मदद के लिये साहूकारों से ऋण उपलब्ध करवाना शुरू किया। फिर उनकी फसल को बिकवाकर उचित मूल्य दिलवाकर उनको आर्थिक रूप से सम्बल प्रदान करना आरम्भ किया। तब मेरों का सोच नकारात्मक से सकारात्मक होने लगा। वे लोग डिक्सन बाबा को इन्सान के रूप में फरिश्ता मानकर उनकी हर बात को तब्बजों देने लगे। फिर क्या था। डिक्सन ने इस क्षेत्र के बीहड़ जंगल को साफ कराकर एक नागरिक बस्ती /आबादी/ बसाने का मानस बना लिया। उन्होंने देखा यह क्षेत्र अधिकतर चरागाह हैं। अतः यहाॅं उन की तिजारत हो सकती है और आस पास के मेवाड़ क्षेत्र में जहाॅं मैदानी भाग है और जहां काली मिट्टी हैं उस ईलाके में कपास की खेती की जाकर रूई का तिजारत किया जा सकता हैं। यह ख्याल आते ही अपने हुक्मरान से नागरिक बस्ती बसाये जाने की स्वीकृति प्राप्त करली।
अनुमति मिल जाने पर अपने सैनिकों को लगाकर जंगल साफ करावाया। जंगल साफ कराने से एक बहुत बड़ा मैदान बन गया। छोटी छोटी पहाडि़यों को तुड़वाकर खड्डे भरवाये और इस प्रकार उबड़ खाबड़ जमीन को समतल करवाकर एक खुला क्षेत्र आबादी हेतु तैय्यार करवा लिया। तत्पश्चात् आबादी बस्ती बसाये जाने के लिये एक अधिसूचना गजट में प्रकाशित करवाई। इस अधिसूचना की प्रति आस पास के तमाम गाॅंवों में, कस्बों में, मारवाड़ में, मेवाड़ में, ढूॅंढार में तथा राजूताने के समस्त छोटी बड़ी रियासतों के साथ साथ शेखावाटी, वर्तमान हरियाणा, मध्य भारत इत्यादि जगह भेजी गई। तब बहुत जगह के बाशिन्दों ने अपना रोजगार नये शहर में आकर करने की सहमति जताई। इस प्रकार ब्यावर एक फौजी छावनी से नागरिक बस्ती में तब्दील हो रहा था। यह मुश्किल कार्य केवल डिक्सन से ही सॅंभव हो सका जिन्होंने प्यार से यंहा के बाशिन्दों को सदियों की लूटपाट के धन्धे से निजात दिलाकर सभ्स समाज में स्थान दिलाया। अतः यहाॅं के मूल निवासी डि़क्सन बाबा को देवता मानते हैं और उनकी पूजा करते है। वर्तमान में आजकल यह मेर ईलाका मगरे के नाम से जाना जाता है जिसका मुख्य शहर ब्यावर है। फौज को राशन बाॅंटने का काम दिलेरामजी को सौंपा जिनको वे नदबई कूम्हेर से ब्यावर लाये थे। फौजीयों की वर्दी रंगने व धोने का काम नागौर के आठ परिवार करते थे। उस समय के वैद्य गुरूरामजी फौजीयों की बिमारी का ईलाज करते थे। सन् 1823 ई. में इस छावनी में कुछ फासले पर दाहिनी ओर एक चालीस कोटड़ीयों की जेल का निर्माण भी किया गया जहाॅं पर खूॅंखार कैदी रखे जाते थे। प्रवासी नागरिकों की रजामन्दी के बाद डि़क्सन साहिब ने ब्यावर शहर की आकृति का नक्शा ईसाई धर्म के पवित्र चिन्ह क्रोस को चुना जिस पर ब्यावर नगर का निर्माण किया जाना था।
 
मेड़वाड़ा बटालियन का इतिहास 
1. सन् 1822 ई. में कर्नल हैनरी हाॅल ने मेरवाड़ा लोकल बटेलियन के नाम पलटन कायम की।
2. सन् 1823 ई. में इस पलटन का नाम मेरवाड़ा बटेलियन नम्बर 14 रक्खा गया।
3. सन् 1826 ई. में इस पलटन का नाम मेरवाड़ा बटेलियन नं. 4 रक्खा गया।
4. सन् 1843 ई. में इस पलटन का नाम मेरवाड़ पुलिस कोर रक्खा गया।
5. सन् 1861 ईं. में इसका नाम अजमेर मेरवाड़ा पुलिस कोर रक्खा गया।
6. सन् 1871 ई. में मेरवाड़ा बटेलियन और बाजाप्ता जमीन पलटन रक्खा गया।
7. सन् 1903 ई. में इसका नाम मेरवाड़ा बटेलियन नं. 44 हुआ।
8. सन् 1857-58 ई. में इस पलटन ने सेण्ट्र्ल में जंग करने के सुलह में जॅंगी ताजीम हासिल की।
9. सन 1914-19 ईसवी के जॅंगे अजीम फोरम में शिरकत की।
10. सन् 1921 ई. मेे बेवजह तखफीफ अहबाज के हिन्दुस्तान में यह पलटन तोड़ दी गई।

144 मेरवाड़ा बटालियन
 
आरम्भ में ब्यावर /नया नगर/ में आकर बसे विभिन्न जातियों के परिवारों सूची उनके काम के काम-धन्धों के आधार पर जनसंख्या इस प्रकार हैः-

क्रम संख्या जाति का नाम   परिवार की संख्या
1 ओसवाल  200
2 अगरवाल 80
3 माहेश्‍वरी 50
4 सरावगी 50
5 विजयवर्गिय 50
6 माली 140
7 केलिको िप्रन्‍टर्स या छीपा 40
8 डायर्स या रंगरेज 8
9 आयरन स्मिथया लौहार 60
10 आयलमेन या तेली 80
11 गोल्‍डस्मिथ या लौहार 50
12 ठठेरा या ब्रास वकस 8
13 लखरमेन या चूडी सेलर्स्  20
14 पोटर्स्   150
15 कारपेन्टर या खाती 30
16 ब्राह्मण या पण्डित 90
17 बारबर्स या नाई  40
18 ढोली   10
19 जतीज् या वैरागीज्  25
20 टेलर्स् या दर्जी 40
21 मेसोनस् 40
22 जाट 40
23 गूजर 6
24 जुलाहे  135
25 जीनगर  8
26 खटीक 12
27 तम्बोली, तम्बाकू विक्रेता,  20
28 रेगर्स् और चमार 180
29  टर्नस् आॅफ आइवरी 9
30  वाटर केरीयर्स्
7
31 कहार  4
32 राजपूत 30
33 किसान और अन्य  35
34 डान्सींग वूमेन या किन्नर  5
35 फकीर या भिक्षु  10
36 धोबी  10
37 घोसी  4
38 बटलर्स  15
39 कायस्थ 4
40 पेपर मेकर्स्  7
41 अन्य  104
42 चीतास्ा 36
43 पटवा  3
44 स्वीपर्स् या हरिजन  40
कुल पर 1950

  •   शहर पनाह के लिये चालीस कोटड़ी की एक जेल अजमेरी दरवाजे बाहर सन् 1823 ई. में बनाई गई जहां पर वर्तमान में तहसील व टे्र्जरी कार्यालय है। इसके आस पास अमलाह वकील और पब्लिक सर्वेण्ट के पचास परिवार निवास करते थे। नगर की चार दीवारी के अन्दर पाॅंच सौ दुकानदार थे जिनमें से तीन सो दुकानें तो व्यापार हेतु थी व दो सो दुकान व्यापारिक वस्तुए रखने हेतु काम में ली जाती थी। साठ दुकान स्थानीय सर्राफों के लियें थी जो हुण्डी बिल्टी का धन्धा करते थे। दस दुकान फत्तेहपुरिया महाजन की थी जो गुड़, शक्कर, मसाले, उन, ई, अफीम, छपे हुए वस्त्र इत्यादि का व्यापार करते थे। बाकी की अन्य दुकानों में विभिन्न प्रकार के व्यापारी किरायेदार थे। ज्यादातर महाजन जंमीदार को कर्ज देने हेतु बोहरा का काम करते थे।