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तिलक युग के राणा प्रताप 
राव गोपालसिंह - राष्ट्रवर खरवा नरेश 

 रचनाकार:- वासुदेव मंगल  

ब्‍यावर राजस्‍थान 

 

Rao Gopal Singh Kharwa
(Rajsthan)



राव गोपालसिंह जी उन इने-गिने महापुरूषों में से थे जिन्होने देश व धर्म के लिये सर्वस्व त्याग देने में ही अपने जीवन की सार्थकता समझीं । जबकि विदेशी शासकों की कूटनीति के कारण भारत के प्रतापी राजा महाराजा भी अपने गत गौरव को भूल चुके थे । ऐसे समय में स्वर्गीय राव साहिब ने अपने अपूर्व त्याग तथा बलिदान द्धारा देश के सामने एक अनोखा आदर्श रक्खा । यह उन्हीं वीर बाॅंकुरे का साहस था जो कि अपनी वंश परम्परागत जागीर की चिन्ता किये बिना अपने आपको देश उद्धारक कार्यो में लगा दिया तथा भारत के क्रान्तिकारी इतिहास में एक अनौखी मिसाल कायम की । 
राव साहिब का जन्म खरवा राज्य परिवार में कार्तिक कृष्णा 11 संवत् 1930 के दिन माधोसिंह जी की पटरानी रानी चुण्डावतीजी (राव साहिब करेड़ा की सुपुत्री) के गर्भ से हुआ । बाल्यकाल से ही आपको देश के प्राचीन गौरवपूर्ण इतिहास ने अत्यन्त प्रभावित किया । आप प्रताप और शिवाजी की वीर गाथाॅंए सुनकर पुलकित हो उठते थे । राव साहिब ईश्वर प्रदत्त गुणानुसार बचपन से ही बड़े गम्भीर, निर्भय और शिकार खेलने के बडे़ इच्छुक थे । 
आपकी शिक्षा मेयो कालेज अजमेर में हुई । किन्तु वहाँ की गन्दी शिाक्षा की प्रणाली से आपको धृणा हो गई तथा 18 साल की आयु में ही आपने मेयो कालेज को तिलांजली दे दी । आपने देखा कि धनिक वर्ग एवं राजा महाराजा अपने-अपने स्वार्थों में लीन होकर राष्ट्रीय हित पर कुठाराघात करने पर तुले हुए है । गौतम बुद्ध की भाॅंति आप भी भरी जवानी में घर से निकल गए और चार भुजा जी के दर्शन करते हुए जोधपुर चले गए । सम्वत् 1951 में जोधपुर नरेश के स्वर्गवास हो जाने पर आप अजमेर आ गये। आपकी रूचि सामाजिक, धार्मिक, एवं राजनैतिक कार्यो की ओर बढ़ने लगी । आप जंगलों में घुड़ सवारी करते हुए कई साधु सन्याषियों के सम्पर्क में आये जिससे आपकी रूचि योग विद्या की ओर हुई । 
आपके पिता के स्वतर्गवासी होने पर कार्तिक कृष्णा 1 सम्वत् 1944 को आप खरवा की राजगद्दी पर बैठे । आपके राजत्व काल में संवत् 1956 का भंयकर अकाल पड़ा जिसे छप्पनिया का काल के नाम से पुकारते है । यह बात आज से ठीक एक सो सोलह  साल पुरानी है । अभी सॅंवत् 2072 चल रहा है । आपने अकाल पीड़ीत जनता के लिये सच्चे प्रजा पालक की भॅंति अपने राज्य का खजाना खोल दिया । आपकी विशाल उदारता का यश चॅंहु और फेल गया । हजारों बच्चे, नर कॅंकाल और पशु स्थान-स्थान पर भूख के माारे तड़प-तड़प कर अपनी जीवन लीला को समाप्त कर रहे थे । उस समय इस पुनीत कार्य से अल्प समय में ही आपकी ख्याति सारे भारतवर्ष में फेल गई तथा देश की विख्यात संस्थाओं द्धारा आप भारत भूषण, धर्म भूषण एंव राजस्थान केसरी की उपाधियों से अलॅंकृत किये गए । 
आप शिक्षा प्रेमी थे । अपने खर्चे से सैंकड़ो विद्यार्थियों को पढ़ाया और कुछ को यूरोप भी शिसार्थ भेजा । आपके पढ़ाये छात्रों में से कुछ तो अग्र क्रान्तिकारी बन गये जिनमें से सोमदत्त, नारायणसिंह, गाढ़ सिंह और कुछ सरकारी उच्च पदों पर आसीन हो गए । 
विद्यानुराग, समाज सेवा, तथा धार्मिक भावनाओं से ओत प्रोत होने के साथ-साथ आप एक उच्च कोटि के क्रान्तिकारी नेता भी थे और इसीलिये आपने सन् 1902 में विश्णुदत्त शर्मा जैसे क्रान्तिकारी को उपदेशक बनाकर भारत के अनेकों स्थानों पर भ्रमणार्थ भेजा था । अक्टूबर सन् 1909 में योगीराज अरविन्द घोष, स्वामी कुमारानन्द के साथ आपके खरवा में पधारें व आपके पास ठहरे । भारतव्यापी सन् 1914 की क्रान्ति के प्रमुख आयोजकों में से आप भी एक थे । अन्य क्रान्तिकारी जो आपके साथ थे जिसमें से रासबिहारी बोस, सरदार अजीतसिंह, राजा महेन्द्रप्रताप, बड़ौदा नरेश, इन्दौर नरेश, ईडर नरेश, सर प्रताप, बीकानेर नरेश सर गॅंगासिंह, महाराणा फतहसिंह, सेठ दामोदरदास राठी, श्री अर्जुन लाल सेठी, ठाकुर श्री केसरी सिंह बारहठ, ठाकुर जोरावर सिंह, श्री खुदीराम बोस, श्री राजेन्द्र लाहिड़ी, श्री विजय सिंह पथिक, ठाकुर मोड़सिंह, पं. जगदीशजी (किशनगढ़) श्री बालकृष्ण शर्मा, श्री विष्णुदत्त, श्री सोमदत्त और श्री रूद्रदत्त आदि थे । इस क्रान्तिकारी संगठन की विशालता काश्मीर से लेकर सिंगापुर तक चली थी । दुर्भाग्य से एक जयचन्द द्वारा सशस्त्र क्रान्ति की योजना का भण्डाफोड़ अंगे्रजी शासन को करा दिये जाने से अंगे्रजी सरकार ने पैशाचिकता से अत्याचार कर इस क्रान्ति को दबा दिया और क्रान्तिकारियों को अनेक प्रकार की यातनाएं देकर मार डाला । राव साहिब भी 29 जुन 1914 में टाट़गढ़ में नजरबन्द कर दिये गए । 30 जून 1914 को चार सो सैनिकों ने खरवा दुर्ग के आभूषण, जवाहरात, सोना, चांदी सब सरकारी कोष में भेज दिया । शस्त्रागार का सारा सामान ब्यावर भेज दिया । घोड़े बग्गियाॅं नीलाम कर दी गई और ठीकाने के कर्मचारियों को हटाकर अपने आदमी रख दिये । नजरबन्दी की हालत में 12 जुलाई 1914 को टाटगढ़ की जेल फाण्दकर राव साहिब ठाकुर मोड़सिंह के साथ अज्ञातवास में चले गए । वाइसराय के राजपूताने के आगमन पर आप सलेमाबाद आ गए । चीफ कमिश्नर के सेक्रेट्री के प्रयत्नों से सम्मान पूर्वक समझौता हो गया । कुछ दिन बाद राव साहिब स्वयं अजमेर आ गए और इन्हें मेगजीन में रक्खा गया । बनारस षड़यन्त्र केस में आप बरी कर दिये गए । परन्तु फिर भी गौरी सरकार ने आपको तिलहट के डाक बंगले में कारावास के रूप में रक्खा । आपके 28 मार्च 1920 में रिहा होने पर आपको दिल्ली व अजमेर मेरवाड़ा प्रान्तीय राजनैतिक परिषद् अजमेर का अध्यक्ष बनाया गया । सन् 1931 में कश्मीर के मुसलमानों ने हिन्दू राज्य के विरोध में आन्दोलन चलाया । इस समय राव गोपाल सिंह जी अपने बत्तीस सैनिक लेकर लााहौर जा पहूॅंचे । वंहा के हिन्दू, आर्य समाजी, सिक्ख जनता ने आपका गर्मजोशी से स्वागत किया । 25,26,27 दिसम्बर 1931 को होने वाले प्रथम रियासतों हिन्दू हितैषी सम्मेलन के आप सभापति चुने गये । 
राजस्थान की इस महान् विभूति ने कश्मीर के कार्य को सुचारू रूप से चलाने के लिये पंजाब के तीन सुप्रसिद्ध नेता भाई परमानन्द, डा. गोकुलचन्द नारंग व मास्टर तारासिंह की एक कार्यकारिणी बनाई। 


आप कुशल लेखक होने के साथ ही साथ उच्चकोटि के वक्ता भी थे । उनकी भाषण शैली प्रति दव्न्दियों पर सीधा प्रहार करती थी । 
स्वर्गीय राव साहिब लोकमान्य तिलक के अनन्य उपासक थे । क्रान्तिकारी विचारों से पूर्ण आप प्रबल समाज-सुधारक भी थे । जेल से छूटने के बाद आप मालवीयजी तथा लाला लाजपतराय आदि के साथ हिन्दू महासभा के कार्यक्षेत्र में आये एंव आपका आर्य समाज के साथ भी निकट का सम्पर्क रहा । 
जीवन के अन्तिम समय में राव साहिब अधिकतर अस्वस्थ्य रहने लगे । उस समय उनकी प्रवृति कृष्ण उपासना की ओर पूर्ण रूप से झुक चुकी थी । राव गोपालसिंह जी राष्ट्रवर खरवा नरेश का 66 वर्ष की आयु में 13 मार्च सन् 1939 को अजमेर में देहान्त हो गया । 
अपने आदर्श, कत्र्तव्य भावना तथा ध्येय के प्रति अदम्य विश्वास ने ही आपको भारत के राष्ट्र निर्माताओं में उच्च स्थान दिलाया है । ब्यावर क्षेत्र को भारत के मानचित्र पर राजनैतिक कार्यकलापों के लिए आप व राठी जी लाऐ । आप दोनो के कारण ही भारत के स्वतंत्रा संग्राम में ब्यावर की महत्ती भूमिका रही । इस संग्राम में ब्यावर राजनैतिक गतिविधियों का केन्द्र रहा । 

 

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