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ब्यावर का इतिहास

रचनाकारः वासुदेव मंगल
 
अरावली की सुरम्य उपत्यकाओं में कई नगर, शहर राजस्थान प्रदेश में बसे हुए है। जैसे अलवर, जयपुर, अजमेर, ब्यावर, केलवाड़ा, सिरोही, आबूरोड़। इनमें से ब्यावर शहर 155 साल पूर्व स्कोटिस कर्नल एलर्फेड डिक्सन द्वारा ्रोस की आकृति पर बसाकर डिक्सन छत्री वर्तमान में पांचबत्ती से एक परकोटे का उसी रूप में निर्माण कराया। यह अथुन खान, चांग खान से बचाने के लिऐ बनाया गया था। इस परकोटे की लम्बाई 10569 फिट है। इसका माप 884161 क्यूबिक फीट है। इसको बनाने में उस समय रूपये 23840/- कीमत लगी। इस शहर की नींव कर्नल डिक्सन ने । फरवरी सन 1836 को प्रातः 10 बजकर 10 मिनट पर अजमेरी गेट पर रक्खी। यह हर तरह से महफूज जगह है। बह ब्यावर का अर्थ है अच्छी किस्मत। डिक्सन 144 मेरवाड़ा बटालियन के सरबराह थे जिन्होेंने फौजी छावनी बसाई। इनके बेरकों में आज पुराना पावर हाऊस, मेगजीन की जगह सदर थाना कायम है। फौजी सफॅाखाना आजकल सिपाहियों के क्वार्टर है। फौजी अफसरों के बंगले आजकल जगंलात का दफतर दुसरे में अमृृतकौर अस्पताल का स्टोर रूम है, तीसरे में नवरंग नगर अबाद हो गया हैं। चैथे में चम्पानगर बस गया है। पांचवे में मुहम्मदअली स्कुल का बोर्डिंग हाऊस, छठे में ईसाईयों ने कब्जा कर रक्खा है। ठेकरी वाले बंगले में अंगे्रजी प्राइमरी स्कूल चलता हैं। यहां पर उस समय बहादूर पहाड़ी जाति रहती थी जिनका काम पहाड़ों से पट्ठियां निकालना, जानवर पालना और खेती करना था। मेरवाड़ा बटालियन ने प्रथम विश्व युद्व में तुर्की के मैदान में जंग जीतने की खुशी में एक तोप व तुर्की के फौजी कमाण्डर का अस्थि-पंजर लाये। तोप नगरपरिषद के सामने रक्खी। अस्थि-पंजर हालेण्ड म्युनिसिपल पटेल स्कूल में रक्खा। इस बटालियन की यादगार आज भी चांदमलमोदी वाजनालय के सामने बगीचे में संगमरमर से बनी हुई है। डिक्सन साहब अजमेरी दरवाजे के बांई तरफ एक नोहरे (वर्तमान में बन्शी भवन) में रहा करते थे। बेगम साहिबा पठान कौम से ताल्लुक रखती थी। बिचडली गांव के नजदीक ही नए नगर की बुनियाद रख दी गई। अहमदाबाद से दिल्ली तक जब रेल्वे लाईन डाली गई तो इस भाग का लाईन के पास बड़ा गांव ब्यावर पड़ता था इसलिये इस स्टेशन का नाम ब्यावर रक्खा गया। स्टेशन के पास बसा नया नगर तरक्की करते करते बहुत बड़ा तिजारती शहर बन गया और समय के साथ साथ नया नगर ब्यावर हो गया और ख्।ास ब्यावर गांव पुराना ब्यावर हो गया हैं। अंग्रे्रजी फौज को हर तरह से महफूज रखने के लिये ब्यावर जगह ही माकूल समझी गई जंहा से राजस्थान की रियासतों पर नजर रखी जा सके। इस भाग की सरकारी जुबान उस समय उर्दू थी। यह भाग फौजी इलाका करार दिया गया था। पहाड़ी इलाका था। पैदावार कम होती थी। अतः गांव के जबां मर्द फौज में अक्सर भर्ती हुआ करते थे जो सिलसिला आज भी इस इलाके में बरकरार है। फौजी लिहाज से ब्यावर की बड़ी अहमियत थी। डिक्सन साहब ने यहां फोजी छावनी स्थापित की। इन्तजामी मामलात अजमेर में तय किये जाते थे। लेकिन फौजी मामलात का केन्द्र ब्यावर ही था। चीफ कमिश्नर (राज्यपाल) अजमेर मेरवाड़े का अजमेर मे रहता था जो सारे अहकामात सभी रियासतों के लिये अजमेर से ही जारी किये जाते थे। 
 
ब्यावर राजस्थान का मेन चेस्टर कहलाता था। यहां पर कपड़े की तीन मिले है। कई गांठें बांधने के पे्रस और रूई पिन्दने की मशीने लगी हुई थी यह जिनिंग फैक्ट्री कहलाती थी। बीड़ी बनाने के बडे कारखाने है जिनमें हजारों औरतें आज भी काम करती है। फैक्ट्रियों की जगह अब कई काॅलोनियां बन गई है। महादेवजी की छत्तरी के पास सट्टा बाजार था जहां हजारों रूपयोें का सट्टा प्रतिदिन होता था। ब्यावर शहर व्यापार में राजस्थान में सबसे आगे था। ऊन, रूई, अफीम की यहां पर मण्डियां थी सारे भारत में पहले नम्बर पर फाजिल्का (अब पंजाब में) और दूसरे नम्बर पर ब्यावर की ऊन की मण्डी थी। यहां से सारे राजस्थान में रूई, कपड़ा, बीडी़, सीने का धागा, अभ्रक, बेरियल, सुरमा, दुसरे भागों को भेजा जाता था। ऊन और भोडल विलायत भेजी जाती थी इसलिये बहुत सी विलायती कम्पनियों ने अपने दफतर यहां खोल रक्खे थे। इसलिये ब्यावर सारे हिन्दुस्तान में मशहुर था। यहां की तिलपट्टी सारी दुनिया में मशहुर हैं। 
 
ब्यावर में गलियों और बाजारों में थोड़ी थोड़ी दूरों पर चैपड़ है जिनकी संख्या 30 से 35 हैं। सब गलियों की बनावट समानान्तर है। पहले अजमेरी दरवाजे से मेवाड़ी दरवाजे और चांद दरवाज से तेजा चैक तक बाजार था। मगर अब हर गली बाजार बन गई है। अब भी बाजार में डिक्सन साहब की छतरी का चैराहा है इसके उत्तर में पंसारी बाजार, फतेहपुरिया बाजार, दक्ष्।िण में कपड़ा बाजार, पुरब में लोहा बाजार व तेजा चैक व पश्चिम में पाली बाजार है। पुराने जमाने में छतरी के पश्चिम में दाहिने हाथ वाली हवेली में पुलिस थाना था जो वर्तमान में गुजरमल भंवरलाल का कटला कहलाता है और पूरब वाली हवेली तहसील थी जो आजकल उदयचन्द बजाज की मिल्कियत है। अजमेरी दरवाजे के बाहर जेल खाना था जो आज तहसील है डिक्सन साहब की अदालत वहीं थी। जहाॅं पर आज अदालत स्थित हैं। डाकधर भी वहीं है जो पहले था। पहले हर दरवाजे के अन्दर पुलिस की चैकी थी जो शहर की निगरानी करती थी जो आज भी अजमेरी दरवाजे को छोड़कर तीनों पर देखी जा सकती हैं। रात को सब दरवाजे और खिड़कियां बन्दकर दी जाती थी। शहर के बहार उत्तर पश्चिम में कई जिनिंग फैक्टियां रूई पीन्दने के कई कारखाने, गांठ बांधने के कई पे्रस, रूई और ऊन रखने के गोदाम थे जो कालान्तर में किशनगंज, महावीरगंज प्रतापनगर न्यू बैंक काॅलोनी बन गई हैं। शहर के बाहर चारों तरफ थोड़ी दूरी पर बगीचियां थीं जो आज भी मौजूद है। शहर के आसपास हर कौम और जाति के आदमी अपने अपने मजहब को मानते हैं। इनमें रावत अपने आपको राजपूत कहते हैं। हिन्दू धर्म से सम्बन्ध रखते हैं। मेहरात, काठात, चीते, कायम खानी इस्लाम धर्म को मानने वाले हैं । इनकी एकता काबिले तारीफ है । ब्यावर शहर की पृष्ठ भूमि में 84 गांव हैं। गांव वाले सर पर लाल रंग का साफा, सफेद धोती, सफेद बखतरी, पैर में अलाऊदृीन शाही जुते पहिनते हैं। मेवाड़ी और मारवाडि़यों बोलियों से मिली हुई मेरवाड़ी बोलियां बोलते है। शादी, ब्याह, रस्मों, रिवाज, चाल-ढाल, खान, पीन, रहन सहन में कोई फर्क नहीं। सभी लोग हंसी-ख्।ुश्।ी से जीवन बसर करते हैं। ब्यावर शहर और देहातियों को मिलाने के लिये डिक्सन साहब ने तेजा मेला शुरू किया था प्यार और मोहब्बत को बढ़ाने के लिये, ब्यावर शहर में धुलण्डी के दूसरे रोज बादशाह मेला आरम्भ किया। इस इलाके में बहुत से ऐसे आदमी मिल जायेगें जो दोनों धर्मो को मानते हैं। लोग ईद, बकरा ईद, होली, दिवाली, मुहरर्म बगैरह मिलकर मनाते हैं। इन इलाकों में आपको कई ऐसे जोडे़ मिल जायेंगे जिनकी मां रावतों में है तो बाप मेहरात कौम का है और बाप रावत हैं तो माॅं मेहरातों की हैं। रावत और मेहरात कौम हर त्यौहार को मिल जुलकर मनाते हैं। यह है गांव की एकता का नमूना। ब्यावर के शूरवीरों का केन्द्र था श्यामगढ़, झाक, लूलवा। होली के त्यौहार पर जगह जगह अहेड़ा चढाया जाता था। श्यामगढ़ का किला और कुण्ड महान स्वतन्त्ऱता सेनानियों की तपोभूमि रही है जिनमें से मुख्य नानाजी फडनवीस तात्यां टोपे, रास बिहारी बोस, चन्द्रशेखर आजाद, सरदार भगतसिंह, मन्मथनाथ गुप्त, केसीरसिंह बारहठ, जोरावरसिंह बारहठ, प्रतापसिंह बारहठ, ठाकुर गोपालसिंह खरवा, विजयसिंह पथिक, अर्जुनलाल सेठी थे। इसी तरह ब्यावर शहर कई महान सपूतों की कर्मस्थली रहा जिनमें से मुख्य सेठ दामोदरदास राठी, सेठ घीसूलाल जाजोदिया स्वामी कुमारानन्द श्यामजी कृष्ण वर्मा आदि थे । इसी प्रकार ब्यावर शहर कई राजनीतिज्ञों का प्रशिक्षण केन्द्र रहा जिनमें से मुख्य है मोहनलाल सुखाडिया जयनारायण व्यास व भैरोसिंह शेखावत। पहले ब्यावर की जन-संख्या कुल 21 हजार थी। लेकिन अब ब्यावर की जनसंख्या 1 लाख 21 हजार है। आज भी ब्यावर में सेठ राठी की हवेली, सेठ चम्पालाल रामस्वरूप की हवेली, सेठ कुन्दनमल लालचन्द की हवेली, नवाब साहब का अन्साहिया, मेडीकल हाॅल, सेठ मजहर की ड्रीमलेण्ड इमारत देखने योग्य। डिक्सन साहब का मकबरा छावनी के पास रेल्वे फाटक के पास स्थित ईसाईयों के कब्रिस्तान में हैं तथा बेगम का मकबरा अजमेरी दरवाजे के बाहर रामद्वारे के सामने अमले के पास मौजूद हैं। पुराना श्यामजी कृष्ण वर्मा पुस्तकालय व चित्रालय आज भी हरिप्रसादजी अग्रवाल के पास सुरक्षित मौजूद है जिसमें ब्यावर के इतिहास का विहंगम दृश्य देखने को मिल जायेगा। आज ब्यावर ने औद्योगिक दृष्टि से पर्याप्त तरक्की की हैं। वर्तमान में ब्यावर शहर के बाहर चारों तरफ अजमेर रोड़ पर दो सौ से ज्यादा सीमेन्ट जालियां व एस्बेस्टोज पाईप बनाने की फैक्ट्रियां है। स्टोन, टाईल्स की फैक्टियां हैं। ग्राईडिंग स्टोन की कई फैक्टियां हैं। साइजिंग की कई फैक्टियां है। प्रिन्टिग डाईग व हैण्डलूम, पावरलूम की अनेक फैक्टियां हैं। प्लास्टिक पेपर बैग की फैक्टियां है। तात्पर्य यह है कि लघु उद्योग और व्यवसाय का यह केन्द्र है। यहां पर कच्चा माल प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं। इसीलिये बांगड़ समूह द्वारा श्री सीमेन्ट लिमिटेड यहां से 7 मील दूर अन्धंेरी देवरी गांव के पास मसूदा रोड पर लगाया गया है जहां पर बीस हजार से ज्यादा सीमेन्ट की बोरियां प्रतिदिन भरकर तैयार की जाती है जो प्रतिदिन पांच लाख रूपये तकरीबन सरकार को राजस्व एक्साईज के रूप में देती हैं, और डेम बोराज ब्रीज बनाने के काम में यह सीमेन्ट लाया जाता हैं। यहां पर 10 बैंकर्स है जो यहां के औद्योगिक व व्यावसायिक समुदाय को ध्।न उपलब्ध कराते हैं। आर. एफ. सी. भी इस क्षेत्र में सक्रिय योगदान और भूमिका प्रदान कर रहे हैं। शिक्षा का अच्छा केन्द्र हैं। यहाॅं पर एक स्नातकोत्तर महाविद्यालय, स्नातक स्तर का बालिका महाविद्यालय, कई उच्चत्तर माध्यमिक विद्यालय, अनेक माध्यमिक प्राथ्।मिक, उच्च प्राथ्।मिक, पूर्व प्राथ्।मिक तथा पब्लिक स्कूल हैं। पश्चिमी रेल्वे का मीटर गेज का दिल्ली अहमदाबाद का मध्य रेल्वेस्टेशन हैं। सड़कमार्ग से राष्ट्रीय राज मार्ग संख्या आॅंठ का मध्यवर्ती शहर है जयपुर, जोधपुर और उदयपुर यहां से लगभग समान दूरी पर स्थित है। अ श्रेण्।ी का अमृतकौर अस्पताल है तथा अजमेर जिले का मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी का मुख्यालय हैं। राजस्थान का सबसे बड़ा उपखण्ड हैं तथा ब्यावर की नगर परिष्।द राजस्थान में सबसे बड़ी व पुरानी नगरपरिष्।द है। राजस्थान में सबसे पुराना गिरजाघर ब्यावर का है। अतः हर दृष्टि से इसको अलग से जिला बनाया जाता है तो मेरी दृष्टि में कोई भूल नहीं होगी। वास्तव में ब्यावर शहर जिला बनाये जाने के काबिले तारीफ है। यह मगरा, मारवाड़ व मेवाड का सिरमोर है। अन्त में में यह ही कहना चाहूंगा कि योजना आयोग, भारत सरकार को अजमेर जिला को औद्योगिक दृष्टि से पिछड़ा क्ष्।ेत्र राजस्थान सरकार की सिफारिश पर घोष्।ित किया जाना चाहिये जिससे ब्यावर शहर को भी औद्योगिक दृष्टि से वे सब सुविधाएं प्राप्त हो सके जो अभी नहीं हो रही हैं तथा बिसलपुर से 5 लाख गेलन पानी प्रतिदिन दिया जाना चाहिये जिससे यहां की आबादी को पीने का पानी तथा उद्योगों को पानी मिल सेके।

 

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