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भॅंवर म्हानें पूजण देयो गणगौर  रचनाकारः वासुदेव मंगल 
 पूजन देयो गणगौर भंवर म्हाने, खेलण देयो गणगौर। 
होजी, म्हारी सखियाँ जोवे बाठ, भॅंवर म्हाने पूजन दयो गणगौर।। 


चैत्र मास के लगते ही राजस्थान की रसवन्ती भूमि में गणगौर के गीतों की आवाज गूॅंजने लगती है और हजारों नारियों द्वारा अपने सुहाग को चिरस्थायी बनाने, बालिकाओं द्वारा भविष्य में सुयोग्य वर प्राप्ति की कामना को लेकर गणगौर पूजा की जाती है। ईसर-गणगौर मुख्यतः राजस्थान प्रान्त का ही मुख्य त्यौहार है। ईसर-गणगौर को शिव-पार्वती का रूप माना जाता है। गणगौर का उद्भव अर्थ कुछ भी रहा हो लेकिन आज तो गणगौर नारियों के अटल अमर सुहाग का प्रतीक है। चेत्र मास के लगते ही राजस्थान में गणगौर की पूजा आरम्भ हो जाती है। इस अवसर पर बालिकाओं द्वारा जो गीत गाए जाते है। उनमें, उनके भोलेपन के कुछ सहज स्वर फूट पड़ते हैं। गणगौर माता से वे प्रार्थना करती है कि उन्हें अच्छा, सुशील, स्वरूपमान, पुरूषार्थी और श्रेष्ठ वर प्राप्त हो। कन्याएँ वर के साथ साथ, उनके माता-पिता, भाई-भौजाई, बुआ-फूफा के लिये भी गीत गाकर गणगौर से इस प्रकार मनोकामना करती है।   
जलहर जामी बाबुल माँगा, रात देही मायड़ माँगा, 
ये माँगा अनघन लाघर लिछमी, जून पिछोवर फूफो माॅंगा, 
माँडा पोवन बुआ, कान कॅंवर सो बीरो माँगा, राई सी भौजाई।  
चेत्र मास की एकम से लेकर अमावस्या के बाद में तीज तक यानि सोलह दिन यह त्यौहार मनाया जाता है। पड़वा चेत्र मास के प्रथम दिन से शीलसप्तमी तक उक्त त्यौहार घर पर ही कन्याओं व महिलाओं के इकटठे होने पर मना लिया जाता है। परन्तु आठ दिन के पश्चात् चैत्र मास की अष्टमी से लेकर तीज तक कन्याएॅं लोटे लेकर पास के बगीचों व कुँओं तक झुण्ड बनाकर जाती है और वहाॅं पर अपने-अपने लोटे फूल-पत्तियों से सजाकर आगे की पंक्ति में तीन चार लोेटों को एक के उपर एक रखकर महिलाॅंए उन लोटों की जेल इण्डूनी सिर पर रखकर लोटो की जैगड के रूप में गणगौर माता के गीत गाती हुई घर लौटती है और लोटे से भरा पानी गणगौर को पिलाती है, गीत गाती है। गणगौर ईसर के भोग लगाती है। इस प्रकार एक स्थान पर गणगौर भिती चित्र बनाकर पूजती है और उस स्थान पर एक एक करके आन्जली, बिन्दोरा गणगौर की करती है। यानी अन्य महिलाएं और बालिकाँए आठ दिन तक गणगौर को बिन्दौरा देती रहती हैं। अन्य पूजने वाली कन्याएं एक-एक करके प्रत्येक रोज गणगौर की मूर्ति को अपने अपने घर ले जाती है। जहाॅं गणगौर के लाड चाव करती है और फिर जिस प्रकार नई दुल्हन को आन्जली बिन्दौरा के साथ उसके गन्तव्य स्थान पर पहुॅंचाया जाता है उसी प्रकार उस सूरत में गणगौर को भी गन्तव्य स्थान पर पूजा करने वाले घर, गीतों को गाते हुए बिन्दौरा देने वाले घर की, मोहल्ले की महिलाएं व बालिकाएं पहुंचाने आती है। जब लड़कियों का झूण्ड बगीचों में प्रवेश करता है तो उनके द्वारा यह गीत गाया जाता है। 

गौर ए गणगौर माता खोल किवाड़ी बाहर उबी थ्हारी पूजण वाली, 
पूजा ऐ पूजारण बायाँ काँई काँई माँगो अन्न और धन मांगा लाभ और लिछमी।  
कन्याएँ प्रसन्न मुद्रा मंे गणगौर पूजती है। यदि कोई कन्या मायूसी में गणगौर पूजती है तो उसे गुस्सा वाला पति मिलता है। अतः गणगौर पूजते समय सभी कन्याएँ खुश नजर आती है। 
जो तू पूजसी रूसी टूसी तो तो रूस्यो वर आयसी राज, 
जो तू पूजे नीमारी डाली तो हरव्यो, हरव्यो वर आयसी राज 
जो तू पूज सी दूबारी डाली तो हरव्यो हरव्यो वर आयसी राज  
इसलिये कन्याएँ गणगौर की पूजा हाथ में दूब लेकर करती है। प्रतिदिन उनके द्वारा नीचे लिखा गीत गाया जाता है।   
गौर गौर गोमती, ईसर पूजे पारवती, 
पारवती का आला गीला गौर का सोने का टीका 
टीका देकर टपका देकर गौरा रानी बरत करयो, 
करता करता आस आया वास आया 
खीर खाण्ड का लाडू लाये लाडू ले बीरा ने दीनो 

इस प्रकार कई बालिकाओं द्वारा घडूला भी गणगौर के समय बाजार में, अलग अलग झूण्ड बनाकर घूमाया जाता है और इस प्रकार नीचे लिखा गीत गाया जाता है।  
घडूला मिट्टी का अनेक छोटे छोटे छेद वाला गोल बर्तन होता है जिसमंे बालिकाएॅं दीपक जलाकर सर पर रखकर गाँव की फेरी करती है।  
घडूलो घूमेलो जी घूमेलो, सेठजी के जायो पूत, घडूलो घूमेलो जी घूमेलो  
इसी प्रकार अन्य गीत गाया जाता है -  
सेठ जी के सात बेटा बाई ऐ गोरा, 
साता की सताई लेश्या बाई ऐ गोरा 
गाडो भर गंवा को लेश्या बाई ऐ गोरा  
इस प्रकार गणगौर के पहिले दिन सिनारे के रोज अलग अलग झूण्ड में बालिकाओं द्वारा गाॅंव के बाजार में दुकानों पर फेरी लगाई जाती है।   
सोलह दिन गणगौर पूजने के पश्चात् गणगौर को विदा करने हेतू उसको जल कुण्डी में विसर्जित कर दिया जाता है। गणगौर को भी उसी प्रकार विदा किया जाता है जिस प्रकार नई दुल्हन को बाबुल के घर से विदा करते हैं।   
गणगौर के त्यौहार की यह परम्परा बहुत पुरानी है। अलग अलग शहरों में मिट्टीनुमा खिलौने वाली गणगौर की विदाई के बाद लकड़ी वाली गण्गौर की सवारी बड़ी धुमधाम से साज, आराज, हाथी-घोड़ों ऊॅंटों को सजाकर रथ, कई प्रकार की झाकियां ट्रकों पर सजाकर बैण्ड बाजों के साथ निकाली जाती है।  
ब्यावर में यह गणगौर लगभग दस रोज तक सजा सवारकर अन्य प्रतिमाओं के साथ माधोपुरिया मोहल्ला, गोपालजी मोहल्ला, माली मोहल्ला व गुजर मोहल्ले, में बैठाई जाती हैं इसके लिये भव्य आकर्षक महफिल और रोशनी गणगौर को बैठाये जाने वाले स्थान पर की जाती है और आखिरी दिन बडी धूम धाम के साथ बैण्ड बाजे गाजे के साथ महादेव छत्री पर बोलावणी की जाती है। इस दृश्य को देखने शहर भर की स्त्री, बच्चों का गणगौर बैठाये जाने वाले स्थानों पर दस पन्द्रह दिन तक मेला लगा रहता हैं और अलग बोलावणी के रोज महादेव छत्री पर मेले का दृश्य होता है। इस आशय के लिये गणगौर वाले मार्ग को भव्य रोशनी से सजाया जाता है जहाँ पर गणगौर ईसर के सात फेरे खाती है।  
पहिले गणगौर को अजमेरी दरवाजे बाहर प्रत्येक दिन साँयकाल पानी पिलाने के लिए ढ़ोल बाजे के साथ ले जाते थे। पिछले कुछ बरसों से यह पानी पिलाने की परम्परा समाप्त कर दी गई है। अब मात्र बोलावणी के रोज ही गणगौर की सवारी निकाली जाती है।   
इस प्रकार समाप्त होता है गणगौर का यह मन भावन त्यौहार चार हप्तों का प्रति वर्ष चेत्र मास पर्यन्त तक। अगली गणगौर का ईन्तजार लिये महिलांए कन्याएं भारी दिल से मन को शान्त करती है अगली साल की गणगौर की मन में आस संजोये। 


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