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नेताजी सुभाषचन्द्र बोस
1897 - ?
रचनाकारः वासुदेव मंगल


बंगाल के चैबिस परगना जिले के कोडोलिया गाँव में 23 जनवरी सन् 1897 ई. के दिन सुभाष का जन्म हुआ। उनके पिता श्री जानकी नाथ बोस उड़ीसा की राजधानी कटक में सरकारी वकील थे। इसलिये सुभाष का प्रारम्भिक जीवन कटक में ही बीता।
सुभाष बाबू में बचपन से ही आध्यात्मिक साधन करने की ईच्छा थी। उनकी माता ने उन्हें रामायण और महाभारत की कथाएँ सुनायी थी। बचपन में ही वे ध्रुव की भाँति बन में जाकर तपस्या करने की कल्पना किया करते थे। प्रायः घर में वे चटाई बिछाकर भूमि पर सोते और एक समय भोजन करते थे। चैदह वर्ष की अवस्था में ही एक दिन घर से भाग खडे़ हुए। छः महीने तक काशी, हरद्वार आदि तीर्थों तथा वन पर्वतों में घूमते रहे। लेकिन कहीं उनके हृदय को सन्तोष नहीं हुआ।


घर लौटकर वे पढ़ने लग गये। बी. ए. होने के बाद पिता ने उन्हें आई. सी. एस. करने के लिये विलायत भेजा। वहाँ वे परीक्षा में ससम्मान उत्तीर्ण हुए। लेकिन जब उनको सरकारी उच्च पद पर नियुक्त किया गया तो लन्दन में ही अपना त्याग पत्र उन्होंने भारत मन्त्री को देते हुए लिखा जो सरकार मेरे देशवासियों पर अत्याचार कर रही हैं, मैं उसका कोई पद स्वीकार नहीं कर सकता।
विलायत से लौटकर सुभाष बाबू सीधे देश सेवा के क्षेत्र में उतर पडे। वे आते ही देश बन्धु चितरन्जनदास से मिले और फिर तो देशबन्धु उनके राजनीतिक गुरू हो गये। कलकत्ता में राष्ट््रीय विद्यापीठ की स्थापना हुई। सुभाष बाबू उसके मुख्याचार्य नियुक्त हुए। युवकों में उन्होंने स्वाधीनता का मन्त्र यहीं से देना प्रारम्भ किया।
पहीली बार सुभाष बाबू सन् 1921 ई. में बॅंगाल प्रान्तीय स्वॅंय सेवक दल के सेनापति होने के कारण गिरफ्तार किये गये। इसके बाद तो जैसे कारागार उनका घर ही बन गया। अंगे्रज सरकार की दृष्टि में, सुभाष बाबू काॅंगे्रस नेताओं में सबसे भॅंयकर थे। सरकार उनको स्वतन्त्र रहने देना नहीं चाहती थी। उन्हें बिना मुकदमा चलाये कई बार अनिश्चितकाल के लिये नजरबन्द किया गया।
सन् 1924 ई. में वे नजरबन्द करके मण्डला /ब्रह्मा/ भेजे गये। वहाॅं बहुत अधिक बिमार हो जाने पर ही सरकार ने दो वर्ष बाद उन्हें छोड़ा। इसके बाद वे औपनिवेशिक स्वराज्य के घोर विरोधी हो गये। उनके ही प्रचण्ड प्रभाव के कारण कलकत्ता काँगे्रस ने सरकार को चुनौती दी और एक वर्ष बाद लाहौर में स्वाधीनता को अपना लक्ष्य घोषित किया।
स्वाधीनता सॅंग्राम छिड़ने के बाद तो सुभाष बाबू को प्रायः जेल में रहना पड़ा। बार बार स्वास्थ्य की खराबी से सरकार उन्हें छोड़ने के लिये विवश होती थी। चिकित्सा के लिये कई बार विवश होकर ही उन्हें वियना जाना पड़ा। गिरते हुए स्वास्थ्य की दशा में भी वे देश की स्वाधीनता का सॅंघर्ष करते रहे। कलकत्ता कारपोरेशन के मेयर तो वे तब चुने गये, जब जेल में थे। कांगे्रस के अध्यक्ष पद पर रहकर उन्होंने जो दृढ़ता दिखायी, उसे देश भूल नहीं सकता। त्रिपुरी कांगे्रस में, वे अध्यक्ष चुने गये महात्माजी का विरोध होने पर भी देश उन्हें कितना चाहता था, यह इसी से ज्ञात होता है।
वर्षों जेल में बिताने के बाद बहुत थोडे़ समय, केवल तीन वर्ष वे बाहर रहे। सन् 1940 ई. में, सरकार ने उन्हें फिर जेल में बन्द कर दिया। लेकिन जब अनशन करने के कारण वे अत्यन्त दुर्बल हो गये तो जेल से निकालकर, उनके मकान में ही, उन्हें सरकार ने नजरबन्द कर दिया। पुलिस के सतर्क रहते हुए भी सुभाष बाबू मकान से निकल गये। वेष बदलकर वे अफगानिस्तान होते हुए जर्मनी पहॅंुच गये। अपने व्यक्तित्व के कारण हिटलर को उन्होंने प्रभावित कर लिया और वहीं आजाद सेना तैयार हुई।
जर्मनी से पनडुब्बी मंे बैठकर वे जापान पहॅंुचें और जापान से वर्मा। वर्मा में उन्होंने आजाद हिन्द सेना बनायी। उनकी आजाद हिन्द सरकार सचमुच एक स्वतन्त्र सरकार थी। उसका अपना मन्त्रीमण्डल था। अपनी सेना थी और लगभग 1500 वर्गमील क्षेत्र पर उसका शासन था।
दुर्भाग्य से जापान के युद्ध में पराजित होने पर सन् 1945 ई. में, सिंगापुर से जापान जाते समय हवाई दुर्घटना में सुभाष बाबू का निधन हुआ यह कहा जाता है। लेकिन उनका जय हिन्द का घोष ,भारत का जयघोष बन गया। भारत की स्वतन्त्रता प्राप्ति में उनका यह अन्तिम सॅंघर्ष ही, सफलता का हेेतु बना, इसमें सन्देह का कोई कारण ही नहीं हैं।

नेताजी सुभाषचन्द्र बोस की शिक्षा


अरे शान्त क्यों तरूण सुजान।
तुम बलवानों से बलवान्।।
 
करो अग्नि का तुम आवाहन।
रहे सदा ज्वालामय जीवन।।
 
भस्म बने कायरता सारी।
दूर हटे ममता बेचारी।।
 
बूढ़ा है वह तरूण नहीं।
जिसमें जाग्रत प्राण नहीं।।
 
तुम दीनों की सुनो पुकार।
पीडि़त जिनकी करूण गुहार।।
 
उनका कष्ट मिटाने आओ।
उनका संकट दूर भगाओ।।
 
प्रिय हो तुमको शुभ बलिदान।
यहीं बहादुर का सम्मान।।
 
नश्वर जीवन जायेगा यह।
अक्सर पुनः न आयेगा यह।।
 
उठो! बढ़ो! करलो कुछ काम।
यही सफलता का है धाम।।
 
कुछ कर जाने की ले चाह।
उठो, न करो बिघ्न परवाह।


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