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राजनैतिक आपातकाल बनाम संवैधानिक आपातकाल

 आलेख: वासुदेव मंगल

  भारत का संविधान लोकतांत्रिक] पंथ निरपेक्ष] समाजवादी व्यवस्था (सिस्टम) में निहित है।  इस गणराज्य की व्यवस्था 26 नवंबर 1949 को अंगीकार की गई थी। तब से 68 साल पूरे हुए। यह व्यवस्था 26 जनवरी 1950 को देश में लागू की गई थी। आने वाली 26 जनवरी 2018 में संप्रभुता का यह 69वां गणतंत्र दिवस होगा।

 भारत के इस संविधान की पहली अग्नि परीक्षा इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री काल में हुई थी। तब इंदिरा गांधी ने लोकतंत्र को आपातकाल की पाठशाला बना दिया था।

 इस संविधान की दूसरी अग्निपरीक्षा अब नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री काल में हो रही है।  अब लोकतंत्र को भीड़ तंत्र में बदलकर रामराज्य का पाठयक्रम पढ़ाया जा रहा है।

 इंदिरा गांधी वाले आपातकाल में और अब वाले अघोषित आपातकाल में फर्क इतना ही है कि तब इंदिरा गांधी की कुर्सी खतरे में थी और अब लोकतंत्र की सम्पूर्ण सँवैधानिक प्रस्तावना संकट में है। प्रचंड जनादेश के साथ विधायिका और कार्यपालिका एकजुट होकर न्यायपालिका की उपेक्षा कर रही है अर्थात् आज केंद्र में किसकी सरकार है वो ही हम भारत के लोगों को डरा रहा है। वह अपनी आस्था और श्रद्धा को संविधान से बड़ा बता रहा है।

 ध्यानाकर्षण यह है कि पिछले कुछ वर्षों में लोकतंत्र को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक अराजकता की चक्की में अधिक पीसा जा रहा है।

 31 प्रतिशत मतों से बनी हुई सरकार और संसद 69 प्रतिशत मतदाताओं की कोई बात नहीं सुन रही है। इसके परिणास्वरूप न्यायपालिका की खुली घेरेबंदी हो गई है।

 आश्चर्य इस बात का है कि लोकतंत्र को 1949 के बाद पहली बार राष्ट्र भक्ति सिखाई जा रही है और कहा जा रहा है कि जो सरकार कहे  वो ही संविधान है और जो नहीं माने वो ही देश द्रोही है।

 ऐसा माहौल और भय से पीड़ित लोकतंत्र तो आपातकाल में भी नहीं था। उस वक्त के आपातकाल में नागरिकों के अधिकार एक सीमित समय के लिए प्रतिबंधित थे। लेकिन आज तो राजनीति के रथ पर धर्म और जाति की सेनाएँ ऊपर से नीचे तक संविधान के मूलभूत उद्देश्यों को ही बदलने की चेतावनी दे रही हैं। यह कह रही है कि न्यायपालिका की सक्रियता और समीक्षा अवांछनीय है और न्यायपालिका को क्यों उसकी हैसियत बताई जा रही है?

तात्पर्य यह है कि लोकतंत्र और संविधान को नया रूप और संविधान को नया अर्थ देने पर सरकार आमादा है।

 हम ऐसा सोचते हैं कि न्यायपालिका और विधायिका के ऐसे टकराव से लोकतंत्र को भारी नुकसान होगा तथा समाज में असहिष्णुता बढ़ेगी।

 लोकराज और रामराज्य का यह संघर्ष 2019 में चरम पर होगा क्योंकि राष्ट्रवाद की संकीर्ण राजनीति में दलित, आदिवासी, महिलाएं और अल्पसंख्यकों को पहले ही न्याय मिलना दुर्लभ है।

 पूरी दुनिया में शासक वर्ग अपनी सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक असफलताओं को छिपाने के लिए वंचित वर्ग को जीवन की बुनियादी सुविधाएं देने की जगह धर्म] जाति की आस्था और अस्मिता की दुहाई दे रहे हैं।

 भूखी नंगी मानवता में राष्ट्रवाद तथा देश भक्ति का जुनून पैदा कर रहे हैं जिससे लोकतंत्र की इस आत्मा में एक अधिनायकवादी दुनिया का साम्राज्य स्थापित हो जाएगा।

इस प्रकार हमारे स्वतंत्रता संग्राम की कोख में जन्मी आजादी और संविधान निर्मूल हो जाएगा।

कांग्रेस मुक्त भारत का अभियान ही असल में आज राष्ट्रवादी हिंदुत्व के उत्थान की राजनीति है। इसलिये न्यायपालिका से बार-बार आत्म समर्पण की बात दोहराई जा रही है।

भारत में अभिव्यक्ति की आजादी पर राज्य और शासन का सबसे कठोर हमला इन्दिरा गांधी द्वारा 1975 में घोषित आपातकाल में मिलता है या फिर 2014 के बाद आये अच्छे दिनों के राजकाज में अब आये दिन देखने को मिलते हे। तब और अब के भारत में भारी विकास और परिवर्तन यह हुआ कि 1960 में तब इलेक्ट्रोनिक मीडिया के असंख्य टी. वी. चैनल और इन्टरनेट पर सवार फेसबुक] टिवटर] ब्लाॅग आदि तथा कम्प्युटर तकनीक नहीं थी और न ही ऐसे उपकरण थे। आज अब ये सब कुछ सरकार के नियन्त्रण से बाहर है और प्रेस एक विशाल मीडिया जगत बन गया है। शब्द की विश्वसनीयता उसके निर्भय आचारण में निहीत है।

आज सच को कोई जिन्दा नहीं देखना चाहता। पत्रकार] लेखकों] बुद्धिजीवियों और आवाज उठाने वालें पर आज सबसे ज्यादा जानलेवा हमले राजनीति] धार्मिक] उद्योग जगत और भ्रष्टाचार से जुडे़ माफियाओं द्वारा हो रहे है और आज इन उग्रवादी धर्मिक तथा आर्थिक संगठनों को चोरी छिपे राज्य और व्यवस्था का संरक्षण प्राप्त है।

फिर पोल खोल और हल्ला बोल की खोजी पत्रकारिता, अपराध जाति से जुडे़ हर वर्ग के हितों को उजागर करती है। आज मीडिया की दखल इतनी जबरदस्त है कि आम नागरिक अन्याय के खिलाफ और सच केे पक्ष में लाभबन्द होकर लोकतन्त्र को बचाने के लिये जिद और जुनून से भरा हुआ है।

आज पूंजीवादी और संकीर्ण धार्मिक ताकतों का पहला दुश्मन एक पत्रकार] लेखक] बुद्धिजीवि और सवाल पूछने वाला आम नागरिक ही हैं। ये लोग अपराधियों की आँख की किरकिरी बने हुए है।

यहीं कारण है कि आज के अंधेरे के युग में नीर्भिक पत्रकारिता, साहसी न्याय व्यवस्था और सक्रिय लोकतन्त्र ही अब भारत के भविष्य को बचाने में लगा है।

कलम के शहीद और सच की मशाल लेकर चलने वाला किसान] मजदूर] युवा] दलित-आदिवासी और भयभीत भारतीय अल्प संख्यक वर्ग ही लोकतन्त्र में मुक्ति की नयी महाभारत आज लिख रहा है।

आजादी के पिछले 70 साल में भारत के लोकतन्त्र को सचको सच कहने वाले मीडिया और निर्भीक नागरिकों ने ही बचाया है।

ऐसे में मीडिया और न्यायपालिका के साथ जगारूक नागरिक की भूमिका इस लोकतन्त्र की प्राण वायु है।

आलेख: ब्यावर शहर के इतिहासविद् वासुदेव मंगल

ब्यावर (राज.) अजमेर

 

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