‘ब्यावर’ इतिहास के झरोखे से.......
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✍वासुदेव मंगल की कलम से.......

छायाकार - प्रवीण मंगल (फोटो जर्नलिस्‍ट)
मंगल फोटो स्टुडियो, ब्यावर
Email - praveenmangal2012@gmail.com

25-07-2026

 

ब्यावर के बिचड़ली तालाब को पर्यटन स्थल बनाना
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रचनाकार: वासुदेव मंगल, ब्यावर सिटी
बिचड़ली तालाब शहर की महत्वपूर्ण जल संरचनाः- यह एक हास्यासपद कार्य होगा कि तालाब पाल विकसित करने पर 1.60 करोड़ पाल का सौन्दयीकरण करने व पाथवे के निर्माण का काम जब कोई मायने नहीं रखता जब तक पाल को सवारने से और तालाब का पेटे मे सिकुड़ने से रोकने का प्रबन्ध साथ नहीं किया जाता है। तालाब के पेटे मे मिट्टी डाले जाने से तालाब का दायरा सिकुड़ता जा रहा है। अतः तालाब का भराव क्षेत्र पहले सुरक्षित करना निहायत आवश्यक है।
तालाब के मूल स्वरूप और जल फैलाव क्षेत्र पर खतरा मंडरा रहा है। यह तालाब में अहम भूमिका निभाता है।
तालाब की संरचना:- तालाब का जल फैलाव क्षेत्र करीब 21.35 हेक्टेयर है। इसका सकल जल ग्रहण क्षेत्र 8.98 वर्ग किलोमीटर है। शुद्ध जल ग्रहण क्षेत्र 5.99 वर्ग किलोमीटर है। तालाब की औसत गहराई करीब 3.2 मीटर है जबकि जल ग्रहण क्षमता लगभग 6.87 मिलियन घनफीट है।
परकोटा जो कभी विरासत था तालाब के किनारे के परकोटे पर अतिक्रमण कर लिया गया है जिस तालाब को आप पर्यटन स्थल बनाने जा रहे हो उसका खुल्लम खुल्ला डेमेज हो रहा है पाल को तो आप खूबसूरत बना रहे हो परन्तु जब इसका अस्तिव ही खतरे में है तो आप इसे कैसे सुरक्षित रख सकते हो समझ में नहीं आता। यह तो ऊँट के मुँह में जीरे वाली कहावत सिद्ध होगी और आपका इस पर 1.60 करोड़ खर्च किए जाने वाला पैसा बेकार जायेगा।
अतः तालाब की मूल संरचना को बचाने की प्राथमिकता होनी चाहिए। इसको संवारने का काम तो बाद का है। जब तालाब का पेटा ही सुरक्षित नहीं रहेगा तो सौन्दर्यकरण किस का कर रहे हो ?
यह ब्यावर का दुर्भाग्य है आजादी के बाद से 78 साल से यहां के स्थायी निवासी भू-माफिया नागरिक नगर परिषद् की उदासीनता के कारण आजादी के बाद मिलीभगती से तालाब, उद्यान, परकोटे का अस्सी प्रतिशत भाग लगभग समाप्त कर दिया गया है अस्सी बरस में लगभग एक प्रतिशत भाग प्रतिवर्ष से खत्म करके। खतरनाक लूट खसोट को रोकने के इरादे से बनाया गया संस्थापक का आर्चीटैक्ट का अद्भुत पच्चीकारी की विरासत को समाप्त करते इनको लज्जा नहीं आती। कोई तो संवारता है, और कोई उजाड़ता है।
कितना जमीन आसमान का फर्क है दोनों प्रकार के कार्यों मे आप देखिये जयपुर के परकोटे को तो धरोहर मानकर संवारा गया है और परकोटे मे बसे हुए स्वरूप को जयपुर शहर की एक अलग इकाई मानकर सुरक्षित किया है। लेखक इसका कारण मात्र देशी महाराजा द्वारा बनाया गया और ब्यावर शहर का परकोटा विदेशी शासक द्वारा बनाया गया मानते है, जिसे वर्तमान भू-माफिया निवासियों द्वारा ढहाया, गिराया व फोड़ा जा रहा है। स्थानीय प्रशासन, के पास विधिनुसार कानूनी प्रावधान होने के बावजूद भी मूक दर्शक बना हुआ प्रतीत हो रहा है। कितनी बड़ी विडम्बना है अतीत के सोच और वर्तमान के सोच मे? अतीत मे पूर्वजों का काम सृजनात्मकता का रहा और वर्तमान जनेरेशन का काम विखण्डन कर धरोहरों के विघटन करने का।
आप देखिये प्रत्येक अतीत मे सार्वजनिक समाज के हित में उपयोग के लिये लोक हित के लिए प्रत्येक संस्था परिसर का स्वरूप निजि, वाणिज्यिक उपयोग मे किए जाने का नजरिया उनके ट्रस्टी या फिर उनके वंशज द्वारा किया जा रहा है। ब्यावर मे तो कदाचित ऐसा हो रहा है। चाहे स्कूल हो औषद्यालय या चिकित्सालय हो, कुएं, बावड़ी, अनाथालय, धरमशाला या फिर गौशोला नदी नाले देवालय या लोकहित की बनाई हुई उनके पूर्वजो या ट्रस्टों द्वारा बनाई भवन सभी परिवर्तन किए जा रहे है। लोकहित मे धार्मिक आस्तियाँ या निधियाँ समाप्त कर उनको कमाई का जरिया बनाया जा रहा है। उदाहरण के लिए जैसे धरमशाला को गेस्ट हाऊस में बदला जाना। गोशाला की जमीनों को खुर्द बुर्द किया जाना औषधालय चिकित्सालय पाठशालाएँ को बन्द कर इन भवनों को वाणिज्यिक उपयोग में किराये देना आदि आदि। यहां तक कि बड़े बड़े कल कारखाना को खुर्द बुर्द कर उनकी मशीनरी जमीन बेच दिया जाना उस पर निर्मित भवन को खण्डित करके फोड़ के उसकी निर्मित सामग्री को अलग से और जमीन को प्लाट बनाकर अलग से बेंच दिया जाना। यह हो क्या रहा है ब्यावर मे खेत खलिहान नोहरे-ढारिये-बाड़ियों तक को बेचा जा रहा है। सार्वजनिक भवनो तक को उनकी सम्भाल करने वाले ही खुर्द बुर्द कर रहे है। सार्वजनिक, तालाबों, मार्गों की जमीनो नदियों के पाट आदि पर अतिक्रमण कर, सत्वाधिकार मानकर बेचे जा रहे है खुल्ला खुल्ला कोई रोक टोक नहीं। लोक हित की आस्तियों को उनकी संस्थाओं के ट्रस्टि द्वारा खुर्द-बुर्द की जा रही है आजकल की जेनेरेशन का विधंस्क (डेस्ट्रक्टिव) सोच कैसे हो गया? समझ मे नहीं आता। जिसको देखों वो ही युद्ध स्तर पर ऐसा, किए जा रहे हैं। शहर की जमीनों या सार्वजनिक परिसम्पतियों को ग्रहण सा लग गया है। ऐसे कामों की जैसे बाढ़ सी आ गई।
आज बिचड़ली तालाब के मध्य मे उदयपुर की झीलों के मध्य बने हुए जैसा केफटेरिया बनाया जाता है तो सुन्दरता के साथ सरकार को स्थाई आमदनी का जरिया हो सकता है। इसके साथ तालाब में कई एलाईड जॉब भी विकसित हो सकते हैं। जैसे मशीन बोट, हाथ बोट आदि आदि की नक्की झील की तरह। नयनाभिराम, भाँति भांति के रंग-बिरंगें वृक्षों के झूरमुट पर बैठे पक्षियों की किलकारी, रंग बिरंगे फूलों से लदी भाँति भांति क्यारियों रंग-बिरंगे फव्वारों की भाँति भाँति की लाईटों का संगीत आदि आदि। तो ऐसे पर्यटन स्थल उद्यानों को विकसित करने की निहायत आवश्कता है. ब्यावर में। बच्चों के भांति भांति के झूले, बच्चों की ट्रेन आदि आदि। भांति भांति के पशु पक्षियों के पिन्जरों वाला चिड़ियाघर भांति भांति की रंग बिरंगी चिड़ियों के पिंजरे। डिफ्रेन्ट कलर की लाईट के म्युजिकल फाउण्टेन (फव्वारे) जैसा कि जोधपुर के उम्मेद पेलेस के पार्क मे व जयपुर विधान सभा भवन के सामने पार्क मे बाँगड सेठ ने लगा रक्खे है। ब्यावर के राजमार्गाे के डिवाईडर पर रंग बिरंगे फूलों के पेड और लाईटिंग पोल के साथ।
 

इतिहासविज्ञ एवं लेखक : वासुदेव मंगल
CAIIB (1975) - Retd. Banker

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