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सन् 1951 से 1962 तक
ब्यावर टाऊन के विकास के आयाम
भाग - 1
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लेखक -वासुदेव मंगल, स्वतन्त्र लेखक, ब्यावर सिटी
जैसा कि ब्यावर का राजनैतिक करियर भारत की स्वतन्त्रता के बाद ब्यावर को
राजस्थान प्रदेश मे मिलाये जाने पर शून्य (नगण्य) रहा है अभी तक, इससे लेखक
को प्रतीत (महसूस) हो रहा है कि पिछले बंयासी सालों से तो ब्यावर क्षेत्र
का तो कोई विकास नहीं हुआ है। राज्य सरकार का और साथ ही केन्द्र सरकार दोनों
सरकारों की ब्यावर के विकास में दिलचस्पी नहीं है, इसका ज्वलन्त उदाहरण
लेखक तो यह मान रहे हैं कि ब्यावर एक अंग्रेज सैन्य हुक्मरान के द्वारा
बसाया गया दो बडी देशी रियासतों के मध्य बसाया गया क्षेत्र है। इसीलिए ही
अजमेर जिले का सब डिविजन होने के कारण ही अजमेर के कारण ब्यावर डिविजन का
विकास अवरुद्ध किया जा रहा है। चूँकि ब्यावर आरम्भ से ही क्रान्तिकारी
गतिविधियों का केन्द्र माना जाता रहा है, इसलिए।
हाँ एक बात जरूर है कि स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद जब अजमेर अलग से भारत
का ‘स’ श्रेणी का छोटा सा राज्य बनाया गया तब अजमेर की मिनिस्ट्री मे श्री
बृजमोहनलालजी ब्यावर से प्रतिनिधि होने से, उन्होंने दो काम जरूर किए। पहला
तो सन् 1954 में ब्यावर के सनातन धरम कॉलेज को डिग्री कालेज बनवाया। उसके
बाद सन् 1956 में लगे हाथ ही पोस्ट ग्रेजुयेट (सोशोलाजी) विषय में कालेज मे
अपग्रेड किया। दूसरा सन् 1954-56 में ही अमृतकौर अस्पताल बनवाकर इसे ‘अ’
श्रेणी में अपग्रेड किया ब्यावर मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (सी.
एम. एण्ड एच ओ ) हेड क्वाटर होने की वजह से।
पहले तो श्री मुकुट बिहारी लालजी भार्गव ब्यावर म्युनिसिपल कमेटी के चेयर
मेन थे 1945 से, फिर बृज मोहन लालजी शर्मा ब्यावर म्युनिसिपल के चेयरमेन रहे
वाईस चेयरमेन, श्याम सुन्दर लालजी एडवोकेट रहे। मुकुटजी के अजमेर के दक्षिणी
अजमेर से संसद सदस्य और बृजमोहनजी के अजमेर राज्य के मिनिस्टर बन जाने के
कारण सन् 1951 ई मे श्री चिम्मनसिंहजी लोढ़ा जो उस वक्त ब्यावर म्युनिसिपल
कमेटी के दूसरे वाईस चौयरमेन थे ब्यावर नगर पालिका के चेयरमेन चुने गए। उस
वक्त चेयरमेन का पीरियड़ तीन साल का होता था। लोढ़ाजी लगातार चार बार सन्
1951 - 1962 बारह साल तक चेयर मैन रहे। उन्होंने इस पीरियड में नगर विकास
के बहुत सारे काम किए सबसे पहले तो चारों बाजारों मे सिमेण्ट की सड़क और
फुटपाथ बनवाया। फिर जालिया और मकरेड़ा तालाब से बारह इन्च की पाईप लाईन पानी
की टंकिया बनवाकर जोड़ी। साथ ही पूरे शहर मे पाईप लाईन बिछाकर पानी का शहर
मे सुचारू, प्रबन्ध किया। फिर आदिवासी जातियों के लिए पक्के मकान बनवाकर
उनको नगर के चारों दरवाजों बाहर बसाया जो पहले अजमेरी गेट के बाहर रामद्वारा
के चारों ओर झोपड़ियाँ बनाकर रह रहे थे। फिर अजमेरी गेट बाहर सुभाषचौक -
संजय मार्केट बनावाया। फिर बस स्टेण्ड को चांग गेट से रामद्वारे के पास
शिफ्ट किया साथ ही रोडवेज का बस स्टेण्ड बनाया। फिर सुभाष चन्द्र बोस,
महात्मा गाँधी और जवाहरलाल नेहरू के स्टैच्यू क्रमशः अजमेरी गेट के बाहर,
सुभाष चौक, चांग गेट बाहर और टाऊन हॉल (नेहरू भवन) के पार्क में लगवाये।
चारों गेट के दोनो ओर गेट बनवाये। जाजोदिया पार्क, कुमारानन्द पार्क, बोहरा
पार्क आदि अनेक पार्क बनवाय। उनमे पानी के फव्वारे लगायें। चांग गेट के
अन्दर दोनों और पार्क बनाकर फंव्वाहरें लगाये। और कुमारानन्द का स्टेच्यू
लगया। फिर सुभाष बगीचे का कायाकल्प किया। शास्त्रीजी का स्टेच्यू शास्त्री
नगर मे लगाया। सुभाष उद्यान में राठी पवेलियन बनवाया और साथ ही जानवरों के
पिंजरे लगाए। बन्दे पर स्नानाघर बनवाये। मेवाड़ी गेट बाहर महाराणा प्रताप का
स्टेच्यू लगाया। जटिया कालोनी, लेबर कालोनी और हरिजन कालोनी बनायी टाटगढ
रोड़ पर। अमृकौर अस्पताल के पास क्रिश्चियन कालोनी बनाई। बिदामदेवी बुरड
धरमशाला बनवाई। अजमेर रोड, चम्पानगर में कालोनिया बसाई। टाटगढ़ के मोड़ पर
पानी की टंकीया बनवाई व बच्चों का पार्क बनाया। नवरंग नगर बसाया। अमृतकौर
अस्पताल के सामने क्लोथ मर्चेण्ट एसोशियेशन से प्रसूतिगृह ( गायनिक वार्ड )
बनवाया। कोटेज वार्ड बनवाया। चम्पानगर मे क्लोथ मर्चेण्ट धरमशाला बनवाई। सी
एम एण्ड एच ओ की ईमारत बनाई। डिग्गी मौहल्ला गर्ल्स स्कूल व छावणी गर्ल्स
स्कूल बनवाई। आदिवासी जाति के बच्चों के लिए कुन्दन भवन गली, गोपालजी
मोहल्ला सिनेमा गली और रायल टाकीज के पास पूर्व प्राथमिक पाठशाला खोली।
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सन् 1951 से 1962 तक ब्यावर टाऊन के विकास
के आयाम
भाग - 2
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सनातन धरम कालेज मे हास्टल और स्टेडियम व प्रोफेसर क्वाटर बनवाये। मेवाड़ी
गेट के अन्दर सिटी डिस्पेन्सरी बनाई। नेहरू नगर बसाया। प्रताप नगर बसाया।
वेल फेयर सेन्टर बनाया। टाटगढ़ रोड पर कालेज के सामने लेबर डिस्पेन्सरी बनाई
आदि आदि।
उस समय शहर मे आठ वार्ड हुआ करते थे। प्रत्येक वार्ड से तीन मेम्बर चूने
जाते थे। इस प्रकार चौबिस मेम्बर चौबिस मेम्बर हुआ करते थे हाँ ब्यावर सिटी
का विकास उस समय बहुत तेजी से हुआ था।
लेखक तो जापान में परमाणु बम गिराये जाने - भारत के आजाद होने से अब तक का
चश्मदीद साक्षी है लेखक की राय में उस समय का खुशहाल जमाना था। आज रुपये का
(मुद्रा) का अवमूल्यन चरम सीमा पर है। महंगाई कई हजार गुणा हो गई है।
रोजगार नहीं है। मध्यम वर्ग सब तरफ से पीस रहा है। सरकार देश को सम्भाल नहीं
पा रही है। एक सो चालिस करोड़ देश की जनशक्ति है। पढे लिखे नौजवान विदेशों
की ओर रुख कर रहे है। यह सब क्या तमाशा हो रहा है?
प्रजा को रोजगार चाहिये। अगर राजा ही प्रजा को रोजगार नहीं देगा तो कौन देगा,
यह देश के सामने ज्वलन्त प्रश्न है जबकि भारत देश में सभी प्रकार के भरपूर
साधन (प्राकृतिक) उपलब्ध है।
पचास के दशक में सस्तीवाड़ा का जमाना था। आवश्यकताए कम थीं। प्रचुर उन्नत
जीवन-स्तर था। तड़क भड़क नहीं थी। घी दूध की नदियां बहती थी। रोजगार प्रचूर
मात्रा में उपलब्ध था। भाईचारा था। परस्पर प्रेमभाव था। उन्नत जीवनस्तर था।
उस समय के पाँच रुपये की कीमत आज के पचास हजार के बराबर थीं अतः दस हजार
गुना महंगाई से हमारे जैसे उस समय के जीव का दम घुटता है। उस समय पेंतिस
हजार जनसंख्या थीं। एक डालर की कीमत एक रूपया थी। आज एक डालर की कीमत सो
रूपया है। अतः भारतीय मुद्रा (करेन्सी) का अवमूल्यन सो गुना हो गया। भगवान
ही मालिक है इस देश का। बृजमोहनजी ने उस समय पटेल स्कूल भवन का एक्सटेन्शन
कर स्कूल को मल्टीपरपज् भी शिक्षा मन्त्री रहते हुए बनाया था। उस समय हर घर
में गाय होती थी। बिमारियों का नाम तक नहीं था। खुशहाल जीवन था। बनावटीपन
नहीं था।
लौढ़ाजी ने चाँदमल मोदी औषधालय बनवाया। चाँदमल मोदी वाचनालय पुस्तकालय बनवाया।
यहां पर पानी की टंकी - माताजी की डुंगरी पर पानी का हौज - अजमेर रोड़ पर -
सुभाष उद्यान में- गिब्सन होस्टल के पास मे पानी की टंकीयाँ बनवाई। इस
प्रकार ब्यावर शहर का सघन विकास किया लोढ़ाजी ने। परन्तु सन् 1962 के बाद
ब्यावर को ऐसा ग्रहण लगा कि आज तक चौंसठ वर्ष ब्यावर के विकास का सिमेन्ट
और पॉवर प्लाण्ट ने बंटाधार कर दिया। बाँगड़ सेठ ने अपना विकास तो जरूर किया
ब्यावर की मिट्टी और पानी से परन्तु ब्यावर का समूल विनाश कर दिया। चांगगेट,
सूरजपोल बाहर और मेवाड़ी गेट बाहर नगर परिषद् की दुकाने बनाई - तेजा चोक और
चांग गेट के अन्दर सब्जी मण्डी बनाई। भगत चौराहे पर छावनी मार्ग पर दुकान
बनाकर उपर मीडिया काम्प्लेक्स बनाया इस प्रकार लोढ़ाजी ने ब्यावर को चमन कर
दिया और नगर पालिक की स्थाई आमदनी का मार्ग प्रशस्त कर दिया। उनका काल
यादगार रहेगा।
यह तो बाद मे बी और सी की आपसी लड़ाई ने ब्यावर का बंटाधार कर दिया। बी
मजदूरों का और सी मील मालिकों का मसीहा बनकर मिल मजदूरों और मालिकों को ऐसा
लड़ाया कि सो साल पुरानी तीनों कपडे की स्प्लििंग एण्ड विविंग मिल्स बन्द हो
गई। व्यापार चौपट कर दिया गया जिसका फायदा पिछले पचास सालों से बागड सेठ
ब्यावर के जल और जमीन का भरपूर फायदा आज भी उठा रहा है। ब्यावर खोखला होता
जा रहा है।
अब भी वक्त है यदि डलब इंजन सरकार चाहे तो ब्यावर पुनः एक बार भारत देश का
ब्यावर जिला सिरमौर बन सकता है क्योंकि यहाँ की जमी में अकूत किमती
बहुमूल्य कई प्रकार की खनिज सम्पत्तियाँ दबी भरी पडी है और सघन जंगल है
जिनका उपयोग जिले के विकास के लिये किया जा सकता है। आवश्यकता है डबल इंजन
सरकार के विकास करने की प्रबल ईच्छा शक्ति की।
आज ब्यावर साठ वार्डाे के साथ नगर निगम बनने का सामर्थ्य रखता है। साथ ही
ब्यावर जिला अलग से संसदीय क्षेत्र बनने की भी क्षमता रखता है। क्रानिक
व्यापार एवं उद्योग और नये नये भांति भांति के उद्योगों के कारण ब्यावर में
हवाई अड्डा बनाया जाना भी निहायत आवश्यक है। यह एक जागरूक सीनियर सिटीजन
ओथर के विचार है जो वास्तविकता पर आधारित है।
यहां पर मारवाड़ - मेवाड़ - मेरवाड़ा तीन रियासतों की लम्बी चौड़ी पृष्ठभूमि
होने के कारण ब्यावर जिले का महत्व बहुत है। अतः यहाँ पर मेडीकल और
इंजिनियरिंग कॉलेज खोले जाने जरूरी हो गए क्योंकि इनके छात्रों का भार इस
ईलाके का बहुत ज्यादा है। साथ ही गर्ल्स पोस्ट ग्रेजएट कालेज भी खोला जाना
चाहिये। वाजिब जानकर लिखा है। जिसपर गौर फरमाकर महत्व देवें ।
15.07.2026
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