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ब्यावर की पैदावार
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रचनाकार: वासुदेव मंगल, ब्यावर सिटी
ब्यावर अरावली उपत्यका मे स्थित जिला है। यहाँ का जलवायु अर्ध शुष्क है। ऐसी
सूरत में खेती भूजल सिचाई पर निर्भर है। कुछ पैदावार मानसूनी बारिश पर
निर्भर है।
ब्यावर की प्रमुख फसल में बाजरा और मक्का है। यह ही ब्यावर का प्रमुख खाद्य
अन्न है। ज्वार चारे और अनाज के लिए उपयोग मे आती है। दलहन मे ब्यावर
क्षेत्र मे मूंग, मोठ चवला की खेती की जाती है। तिलहन मे तिल, मूंगफली और
कपास की खेती होती है। इनसे तेल निकाला जाता है जो साग सब्जी बनाने के काम
आता है। आप देखिये ब्यावर तो कपास ऊपज की भारत देश की प्रसिद्ध प्रमुख मण्डी
रही है। कपास को जिनिंग कर रुई अलग करी जाती है जो सूती वस्त्र बनाने की
प्रमुख उपज है। रुई से तकुओं के जरिये धागा बनाया जाता है जिसे स्पिनिंग
कहते है अर्थात् कातना। तकुए के बोबिन बनाकर उनसे कपड़े की बुनाई होती है
जिसे ताना बाना कहा जाता है अर्थात् विवींग (बुनाई) करना स्पेण्डल से। यह
प्रोसेस (क्रम) लगातार मशीनों के द्वारा चलता रहता है और कपड़ा बुना जाता है
अतीत मे ब्यावर मे इस प्रकार सूती वस्त्र बनाने की तीन मिल्स कार्यरत रही
है जिसमे चौबिसों घण्टे आठ-आठ घण्टे के अन्तराल से तीन पारिया चलती रहती
लगभग सौ साल तक इन मिलों का अस्तित्व रहा जिनमें लगभग पांच हजार लेबर काम
करते थे। सूती वस्त्र उद्योग ब्यावर की शान रही है। कपासिया यानि बीज पालतु
गाय को खली के रूप मे बाँटें मे उपयोग मे लिया जाता तो इस प्रकार तिल
मूंगफली और कपास नकदी फसलें कहलाती है। ये सब खरीफ की फसल है जो मानसून
सिजन मे बोई जाती है जो वर्षा पर आधारित है।
अब वर्णन करते है रबी की फसल काः- रबी की फसल सर्दी के सीजन से बोई जाती
है। गेंहूँ और जो सर्दियों में उगाई जाने वाली मुख्य अनाज की फसल है। इसी
सीजन में सरसों की खेती तिलहन के रूप मे की जाती है। और चना मुख्य रूप से
दलहन (दाल) के रूप मे पैदा किया जाता है। सरसों से तेल निकाला जाता है। चने
से दाल बनाई जाती है जिसे पीसकर बेसन (आटा पाउडर) बनाया जाता है जिससे कई
प्रकार के मिठाई और नमकीन व्यंजन बनाये जाते है। गेहूँ को पीस कर आटा पाउडर
बनाया जाता है जिससे रोटी- डबल रोटी - टोस्ट बनाए जाते है बहुत बारीक गेहूँ
की पिसाई कर मैदा बनाई जाती है। जिससे कई प्रकार की मिठाईयां बनाई जाती है।
इसी प्रकार ग्वार की फसल पालतु जानवरों को खिलाने के काम ली जाती है। बाजरे
से भी रोटी बनाई जा जाती है। मक्का से भी रोटी बनाते है। अतः गेहूं, बाजरा
और मक्का का अनाज के रूप में उपयोग होता है। ज्वार की रोटी भी मीठी और
लाजवाब बनती है। कई जगह जौ के साथ चना मिलाकर तो कई कहीं पर जौ अनाज के रूप
मे खाया जाता है। अतः गेहूँ, जौ, बाजरा, मक्का, ज्वारा अनाज खाद्यान के रूप
में।
दलहन अर्थात दाल वाली फसले दलहन कहलाती है जो मूंग, मोठ चवला और चना उडद और
तिलहन के रूप मे तिल, मूंगफली, सरसों, कपास जो नकदी फसलें कहलाती है और
ज्वार, मैथी, घास पालतू पशुओं के चारे के लिए खिलाने के उपयोग मे चारे के
रूप में होता है, जिससे जानवरों का पोषण होता है।
सब्जी के लिए - टमाटर, हरी मिर्च, फूल गोभी, मटर और प्याज की पैदावार होती
है यह भी केश क्रोप कहलाती है अतः ब्यावर जिला फिर भी सर-सब्ज जिला है जहां
पर सब प्रकार की फसलों की पैदावार की जाती है अनाज, तिलहन, दलहन और सब्जी
के लिए। है ना ब्यावर मे नहीं कुछ में बहुत कुछ। तो यह है ब्यावर जिले की
खूबी इन्द्रधनुषी संस्कृति जहाँ सभी प्रकार के खाद्यान पदार्थ, खान-पान,
वेष भूषा, भाषा, और मेले उत्सव-त्योंहार मनाए जाते है। सभी लोग अपनी-अपनी
संस्कृति के रंग मे रंगेें हुए है। व्यापार के साथ साथ भाँति-भाँति के
उद्योग धन्धे, बोलिया आदि। सरकार यदि प्रोत्साहन दे तो ब्यावर अतीत की भांति
रिच (धनाढ्य) जिला बन सकता है। यहाँ के निवासियों में मेदा और ऊर्जा शक्ति
बहुत है आवश्यकता है मात्र इसको एक्सीलेरेट करने की मोटीवेट करने की।
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