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ब्यावर में विविधता में
एकता
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रचनाकार: वासुदेव मंगल, ब्यावर सिटी
विविधता में एकता भारत देश का संस्कृति की अक्षुणन समरसता है। यह समाज की
प्राण वायु है। आप देखिये भारत में लगभग सभी धर्म, जातियाँ, भाषा, वेषभूषा,
खान-पान, क्षेत्र आदि अवस्थित है। फिर भी यहाँ के निवासियों में परस्पर
भाईचारा, प्रेम-भाव मेलजोल, सहभागिता, समर्पण की भावना काबिले तारीफ है।
यह भाव ही ब्यावर शहर और जिले में और जिले में इसकी स्थापना से ही दिखलाई
देता है। ऐसा लगता है जैसे पूरा हिन्दुस्तान ब्यावर मे आकर बस गया है।
आरम्भ से ही यहाँ पर सभी धर्म, जाति के लोग आकर बसे और अपना-अपना पुश्तैनी
कारोबार स्वतन्त्र रूप से करना शुरू किया। परन्तु उनका सभी के साथ प्रेमभाव
का संबंध भी कायम आज भी एक सो नब्बे बरस बाद जीवन्त है। ऐसी मानव प्रेम की
सौहाद्रता अनूठा गुण सहज ही अनुकरणीय रहा है।
परन्तु समय के परिवर्तन के साथ ही जब यहाँ की शासन प्रणाली में आमूल चूल
बदलाव आया तो सारी विकास करने की व्यवस्था ढ़ह गई। राजनैतिक बदले की भावना
के साथ ही स्वार्थपरता की भावना ने इसका स्थान ले लिया।
ऐसा कारक इस ईलाके में प्रत्यक्ष लक्षित हुआ है एक सौ इक्कीस साल का सफल
समय था। परन्तु यह सत्तर साल का समय इस ईलाके को झकझोरने वाला रहा है। पता
नहीं क्यों यहां ऐसा घूण लगा कि अतीत का गौरव समाप्त हो गया। पहले तो बी और
सी की लड़ाई ने यहाँ के विकास को ग्रहण लगाया। बाद मे बांगड ने यहां की हुई
प्रगति को समूल ही नष्ट कर दिया उसका वश चलता तो ब्यावर का नाम बांगड नगर
कर देते अगर थोड़ा सा समय उनको और मिल जाता तो। ब्यावर को बर्बाद करने में
कोई कोर-कसर बाकी नहीं रख छोड़ी।
यह तो ब्यावर के भाग्य ने पलटा खाया कि अकस्मात जिला बनाया गया इस गरज से
ताकि चौथी बार गहलोत जी की लगातार प्रदेश का राज करने की ईच्छा शक्ति ने ही
जिला बनाया। सन् 1998 मंे ही मुख्यमन्त्री बनते ही श्री अशोक गहलोत ने यहां
पर अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट लगा दिया था जिस पद को ब्यावर जिला घोषित करते
वक्त तक रिक्त रखा। यहाँ पर अपवाद स्वरूप लेखक का यह मानना है कि मुख्य
मंत्री गहलोत जी चौथी बार विधायक बन भी गए परन्तु उनके नसीब मे मुख्यमन्त्री
का चौका नहीं लिखा था। उनकी पार्टी अल्प मत मे होने से यह अवसर नहीं मिला।
परन्तु उन्होंने अन्य नये जिले के साथ ब्यावर को जरूर जिले का तमगा दे दिया।
वास्तव मे लेखक का भी 1990 से निरन्तर यह प्रयास सफल हुआ। हालांकि यहाँ पर
ऐसा कुछ भी कट्टरपन नहीं है फिर भी हमारी अपनी चुनिन्दा सरकार ने इस सर
सब्ज मेरवाड़ा प्रदेश को बर्बाद करने का टारगेट क्यों बनाया समझ में नहीं आया?
लेखक को तो इसे बांगड़ कोरपोरेट घराने का केन्द्र और राज्य सरकार पर एक तरफा
प्रभाव लगा समझ में आया वरना यह ईलाका तो एक बार पुनः भारत देश के वाणिज्य
और उद्योग की रीढ़ होता। देर से ही सही ब्यावर जिला बना दिया गया यह ही बहुत
बड़ी बात है। ना उम्मीद - उम्मीद मे बदली। गहलोतजी ने मात्र लेखक से इतना ही
पूछा कि आप बताए यह जिला कैसे बनेगा? इसमें कोई अड़चन नहीं थी। मैंने भी
तुरन्त बता दिया 1838 में मेरवाडा बफर स्टेट का जो तीन रियासतों को मिलाकर
बनाया उसे पूनः एक बार वैसा ही आकार देकर ब्यावर जिला बना दीजिए, किसी को
कोई एतराज नहीं होगा। हाँ फर्क सिर्फ इतना पड़ेगा कि आबू और भीम की जगह
रायपुर और जैतारण तहसील को ब्यावर जिले मे ले लिजिएगा। उनके दिमाग मे यह
बात बैठ गई और ब्यावर जिला बन गया। गहलोतजी को लेखक की बहुत बहुत बधाई।
शायद ब्यावर के भाग्य में जिला बनना लिखा था, बन गया वरना नहीं बनता। अब
सवाल है इसके विकास का तो सरकार दलगत राजनीति से ऊपर उठकर ही विकास सम्भव
है प्रकृति ने सन साधन बहुत दिये है। परन्तु उन्हें मूर्तरूप प्रदान करने
से ही विकास हो सकेगा। इसका रचनात्मक पहलू क्रॉनिक व्यापार और उद्योग ही
इसको गति प्रदान करेंगे ऐसा वातावरण यहां का है। यह संस्कृति आज भी यहां
मौजुद है सरकार एक बार आजामा कर देखे खुद व खुद मान जायेगी कि विकास की
गुंजाईश है। हाँ तह दिल से विकास सम्भव है और होगा। यह लेखक का मानना है कि
हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई ,बौद्ध, जैन सभी जन एक है।
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